[2026:RJ-JD:52468]
HIGH COURT OF JUDICATURE FOR RAJASTHAN
AT JODHPUR
S.B. Criminal Miscellaneous Bail Application No. 15757/2025
CNR: RJHC011183422025 | URN: CRLMB / 32816U / 2025
(Second Bail)
Rakesh (Presently Lodged In Central Jail, Jodhpur) ----Petitioner
Versus
State of Rajasthan, Through Public Prosecutor ----Respondent
For Petitioner(s): Mr. Ram Niwas
For Respondent(s): Mr. Sameer Pareek, P.P. with Mr. Om Prakash Choudhary
[NyayVidhan notes: Stored from the official Rajasthan High Court PDF of the order (hcraj file 205300157572025_2.pdf, 11 pages, uploaded 27.10.2026). (1) The order is written in Hindi; counsel's list of decisions (paragraph 05) and the case names and citations are in English. The Hindi text is set in the legacy Kruti Dev font in the PDF and was converted to Unicode Devanagari by NyayVidhan and checked against the rendered pages; the dashes of the print appear as hyphens. Conversion breaks were mended: the visarga in 'मनःप्रभावी', 'पुनः', 'अतः' and 'परिणामतः' (eight places) and the closing quotation mark of '“जुड़वा शर्तें”' (paragraph 15). (2) The opening paragraph carries no number in the print; the Court's own paragraph numbers 02-19 (02-09 with a leading zero) are kept as printed. The four numbered entries of the table of dates printed above the opening paragraph are shown as (1)-(4); the table in paragraph 02 is reproduced as rows separated by '|'; counsel's numbered list of six decisions in paragraph 05 runs on from its introducing sentence. (3) The text is otherwise as printed, including 'order dated 23 March, 2017' without a closing full stop (paragraph 05), 'कि- मैं' (paragraph 08) and 'पी.डब्ल्यू.02' (paragraph 11). (4) The cause title is abridged: the petitioner's parentage, age and address are omitted. The registration number of the car in paragraph 08 is withheld by NyayVidhan and replaced by a bracketed note. (5) The order prints no 'Reportable' mark. (6) Page furniture (QR codes, page numbers, running heads, upload/download stamps, staff lines and the TCPDF line) is removed. The PDF is authoritative.]
[Source: Rajasthan High Court, hcraj.nic.in — order dated 27.10.2026.]
HON'BLE MR. JUSTICE CHANDRA SHEKHAR SHARMA
Order
(1) Date of conclusion of arguments: 14.10.2026
(2) Date on which the order was reserved: 14.10.2026
(3) Whether the full order or only operative part is pronounced: Full Order
(4) Date of Pronouncement: 27.10.2026
प्रार्थी-अभियुक्त राकेश की ओर से यह द्वितीय जमानत आवेदन धारा 483 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन पुलिस थाना कापरड़ा, जिला जोधपुर (ग्रामीण) में दर्ज प्रथम सूचना रिपोर्ट संख्या 107/2024 अपराध अंतर्गत धारा 3/25 आयुध अधिनियम एवं धारा 8/18 स्वापक औषधि एवं मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम (जिसे आगे अधिनियम के नाम से संबोधित किया गया है) के मामले में प्रस्तुत किया गया है।
02. प्रार्थी-अभियुक्त से संबंधित मामले में आक्षेपित विवरण निम्न प्रकार से हैं :-
क्रम संख्या | मामले का विशेष विवरण
01 | एफ.आई.आर. संख्या | 107/2024
02 | संबंधित पुलिस थाना | कापरड़ा
03 | जिला | जोधपुर (ग्रामीण)
04 | अपराध अंतर्गत धारा | 8/18 NDPS & 3/25 Arms Act
05 | गिरफ्तारी की दिनांक | 02.09.2024
03. प्रार्थी-अभियुक्त का प्रथम जमानत प्रार्थना पत्र इस न्यायालय द्वारा दिनांक 20 अगस्त, 2025 को Not-Press करने के आधार पर जब्ती अधिकारी के बयान लेखबद्ध होने के पश्चात् पुनः प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता के साथ निस्तारित किया गया था।
04. मैंने योग्य अधिवक्ता प्रार्थी-अभियुक्त व योग्य लोक अभियोजक की बहस सुनी एवं अभिलेख का अवलोकन किया।
05. प्रार्थी-अभियुक्त के योग्य अधिवक्ता ने मुख्य रूप से यह तर्क दिए कि उसका प्रथम जमानत प्रार्थना पत्र जब्ती अधिकारी के कथन लेखबद्ध करने की स्वतंत्रता देते हुए बल नहीं देने से निस्तारित कर दिया गया था। इसके बाद प्रकरण में कुल दो गवाहों के कथन विद्वान विचारण न्यायालय के समक्ष लेखबद्ध किए जा चुके हैं, जिसमें पी.डब्ल्यू.-2 मूल सिंह भाटी जब्ती अधिकारी भी शामिल है। गवाह द्वारा दी गई साक्ष्य से यह स्पष्ट है कि इस प्रकरण में अधिनियम की धारा 42 के आज्ञापक प्रावधानों की पालना नहीं की गई थी, क्योंकि प्रारंभ से ही गुप्त सूचना प्राप्त थी और जिस वक्त मौके पर तलाशी और जब्ती की कार्यवाही की जा रही थी, तब तक सूर्यास्त हो चुका था, अर्थात सूर्यास्त और सूर्योदय के बीच में तलाशी और जब्ती की कार्यवाही की गई थी। ऐसी स्थिति में बिना वारंट तलाशी हेतु विश्वास के कारणों को अभिलिखित करते हुए उच्च अधिकारियों को प्रेषित नहीं किया गया। घटनास्थल पर भी कोई जब्ती की कार्यवाही नहीं की गई थी, बल्कि अन्य स्थान पर की गई और जो वीडियोग्राफी की गई थी उसे पेश भी नहीं किया गया। जब्तशुदा मादक पदार्थ के नमूने भी काफी विलंब से रासायनिक विज्ञान प्रयोगशाला परीक्षण हेतु प्रेषित किए गए। घटना के समय पी.डब्ल्यू.-2 मूल सिंह भाटी बिलाड़ा थानाधिकारी के पद पर कार्यरत था, इस स्थिति में उसे कापरड़ा में कार्यवाही करने के लिए उच्च अधिकारियों द्वारा अधिकृत किया गया हो, ऐसा कोई आदेश भी नहीं था। गिरफ्तारी के बाद से दो वर्ष से अधिक समय से वह अभिरक्षा में है। अभी भी शेष गवाहों के कथन लेखबद्ध करने में और विचारण पूर्ण होने में काफी समय लगने की संभावना है। इस प्रकार अधिनियम के आज्ञापक प्रावधानों की पालना नहीं होने और संपूर्ण कार्यवाही प्रार्थी अभियुक्त को फँसाने की नियत से गलत रूप से किए जाने से प्रार्थी का यह जमानत आवेदन स्वीकार करते हुए उसे जमानत पर छोड़ने की प्रार्थना की। अपने उक्त तर्कों के समर्थन में योग्य अधिवक्ता प्रार्थी-अभियुक्त ने निम्न न्यायिक दृष्टांत प्रस्तुत किए, जिनका मैंने अवलोकन किया :- 1. State of Rajasthan v. Jag Raj Singh @ Hansa, (2016) 11 SCC 687; 2016 INSC 444. 2. Ramaram v. State of Rajasthan — S.B. Criminal Miscellaneous Second Bail Application No. 3244/2026, Rajasthan High Court, order dated 17 April, 2026. 3. Sandeep v. State of Rajasthan — S.B. Criminal Miscellaneous Bail Application No. 11678/2025, Rajasthan High Court, order dated 13 July, 2026. 4. Arjun v. State of Rajasthan — S.B. Criminal Miscellaneous Bail Application No. 3320/2025, Rajasthan High Court, order dated 15 July 2026. 5. Lalchand v. State of Rajasthan — S.B. Criminal Misc. Application for Suspension of Sentence No. 1335/2016 in Criminal Appeal No. 916/2016, Rajasthan High Court, order dated 23 March, 2017 6. Gumanmal v. State of Rajasthan — S.B. Suspension of Sentence (Appeal) No. 327/2017 in Criminal Appeal No. 454/2017, Rajasthan High Court, order dated 7 April, 2017.
06. उक्त तर्कों के खंडन में विद्वान लोक अभियोजक ने तर्क दिया कि प्रार्थी अभियुक्त एवं प्रकरण के एक अन्य सह-अभियुक्त के कब्जे से मादक पदार्थ 7 किलो 96 ग्राम अवैध अफीम के साथ-साथ एक विदेशी पिस्टल और पाँच जिंदा कारतूस की बरामदगी की गई है, जो कि वाणिज्यिक मात्रा में होकर अत्यधिक है। विद्वान विचारण न्यायालय के समक्ष विचारण भी चल रहा है। अभिलेख पर ऐसी कोई स्पष्टतया स्थिति प्रकट नहीं होती है कि विद्वान विचारण न्यायालय के समक्ष अन्वीक्षा की कार्यवाही रुकी हुई हो अथवा गवाह उपस्थित नहीं आ रहे हों। पूर्व में इसी प्रकरण के सह-अभियुक्त मनोज को इस न्यायालय की समकक्ष पीठ द्वारा दिनांक 20.12.2024 को अंतरिम जमानत की सुविधा दी गई थी, इसके पश्चात वह फरार हो गया था और प्रार्थी अभियुक्त को भी यदि जमानत की सुविधा दी जाती है तो प्रकरण की अन्वीक्षा प्रभावित होने की संभावना है। अतः अभिलेख की स्थिति को देखते हुए प्रार्थी-अभियुक्त का जमानत आवेदन खारिज किये जाने का निवेदन किया।
07. मैंने उपर्युक्त परस्पर विरोधी तर्कों पर विचार किया। पत्रावली के अवलोकन से यह प्रकट होता है कि थानाधिकारी मूल सिंह मय जाब्ता पुलिस थाना बिलाड़ा व जिला विशेष टीम प्रभारी करणीदान उपनिरीक्षक मय जाब्ता द्वारा ग्राम बीनावास में समय 12:20 ए.एम. पर इत्तला के अनुसार नाकाबंदी करने पर एक स्विफ्ट कार में से प्रार्थी अभियुक्त राकेश एवं प्रकरण के ही एक अन्य सह-अभियुक्त मनोज कुमार के सचेतन कब्जे से प्लास्टिक की थैलियों में कुल 7 किलो 96 ग्राम अवैध अफीम का दूध बरामद किया गया था। साथ ही इनके पास से एक पिस्टल जिस पर मेड इन स्पेन लिखा होकर पाँच जिंदा कारतूस 9 एम.एम. के भी बरामद किए गए थे। तत्पश्चात विधिनुसार कार्यवाही की गई थी।
08. पूर्व में प्रार्थी अभियुक्त का प्रथम जमानत प्रार्थना पत्र दिनांक 20.08.2025 को जब्ती अधिकारी के कथन लेखबद्ध करने की स्वतंत्रता देते हुए निस्तारित किया गया था। तत्पश्चात इस प्रकरण में विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा गवाह पी.डब्ल्यू.-1 अशोक चौधरी एवं पी.डब्ल्यू.-2 मूल सिंह भाटी के कथन लेखबद्ध कर लिए गए हैं और पी.डब्ल्यू.-2 मूल सिंह भाटी इस प्रकरण का जब्ती अधिकारी भी है। विद्वान विचारण न्यायालय के समक्ष साक्ष्य के दौरान उक्त गवाह ने यह कथन किया कि- मैं दिनांक 01.09.2024 को पुलिस थाना बिलाड़ा में थानाधिकारी के पद पर कार्यरत था और उस रोज पुलिस अधीक्षक जोधपुर ग्रामीण के आदेशानुसार पुलिस थाना कापरड़ा का कार्यभार भी मुझे सौंपा गया था और उसी दिन वक्त 10:50 पी.एम. पर डीएसटी के कांस्टेबल पप्पूराम द्वारा मुखबिर इत्तला से अवगत कराया गया कि मनोज पुत्र दिलीप कुमार व राकेश पुत्र लक्ष्मण राम एक स्विफ्ट कार [registration number withheld by NyayVidhan], जिसमें अवैध अफीम लेकर आ रहे हैं, यदि शीघ्र नाकाबंदी की जावे तो इनके पास से अवैध अफीम बरामद हो सकती है। उक्त इत्तला विश्वसनीय होने से ही इसे मुर्तिब किया गया था, जो प्रदर्श पी.17 है। इस इत्तला को धारा 42 एनडीपीएस एक्ट के तहत विशेष वाहक कांस्टेबल आजाद के साथ जिला पुलिस अधीक्षक जोधपुर ग्रामीण एवं वृत्ताधिकारी बिलाड़ा को देने हेतु रवाना किया, जिसकी फर्द प्रदर्श पी.18 पर ए से बी मेरे हस्ताक्षर हैं और सी से डी सूचना प्राप्ति के हस्ताक्षर हैं। तत्पश्चात अनुसंधान बॉक्स लेकर इत्तलानुसार मौके पर पहुँचना और नाकाबंदी के दौरान ही एक स्विफ्ट कार आती दिखाई देने पर उसे रोककर चालक सीट पर बैठे व्यक्ति का नाम पूछा तो मनोज होना बताया और चालक के पास वाली सीट पर बैठे व्यक्ति ने अपना नाम राकेश पुत्र लक्ष्मण राम होना बताया था। इसके पश्चात गवाह का यह भी कहना है कि रात्रि का समय होने व मौके से न्यायालय की दूरी अधिक होने के कारण बिना वारंट तलाशी लिया जाना आवश्यक होने से फर्द बिना वारंट खाना तलाशी मुर्तिब की, जो प्रदर्श पी.03 है, जिस पर ए से बी व सी से डी मोतबिरान के और ई से एफ स्वयं के हस्ताक्षर होना कहा। तत्पश्चात उक्त दोनों को ही अधिनियम की धारा 50 का नोटिस देकर कार की तलाशी लेने पर कार में से कुल 7 किलो 96 ग्राम अफीम का दूध और एक पिस्टल जिस पर मेड इन स्पेन लिखा होकर पाँच जिंदा कारतूस बरामद हुए थे, जिसके बारे में कोई लाइसेंस नहीं होना बताया।
09. प्रतिपरीक्षण में इसने स्पष्ट किया कि दिनांक 01.09.2024 को पुलिस थाना बिलाड़ा में थानाधिकारी के पद पर कार्यरत था और पुलिस थाना कापरड़ा का एसएचओ सुरेंद्र कुमार थे, लेकिन इस बात को गलत कहा कि उसे सीजरकर्ता के रूप में एस.पी. साहब द्वारा अधिकृत नहीं किया गया हो। यह स्वीकार किया कि जिस जगह वाहन को दस्तयाब किया था वहाँ बरामदगी की कार्यवाही नहीं की गई थी और वाहन को सरकारी वाहन से टोचिंग करके लेकर आए थे। गवाह के अनुसार पास ही स्थित टोल पर ले जाकर कार्यवाही की गई थी। यह स्वीकार किया कि बरामदगी सूर्यास्त के बाद व सूर्योदय के बीच की थी और बरामदगी की कार्यवाही टोल नाके पर वाहन को लाकर किया जाना कथन किया। अभियुक्तगण की व्यक्तिगत तलाशी में कोई मादक पदार्थ बरामद नहीं होना बताया और बरामदशुदा माल के नमूने परीक्षण भी बरामदगी से करीब 11 दिन पश्चात एफ.एस.एल. में जमा होना गवाह ने कथन किया। गवाह के अनुसार इसके द्वारा जो वीडियोग्राफी कराई गई थी, वह पत्रावली पर नहीं है।
10. इस प्रकार उक्त कथनों से यह स्पष्ट है कि जब्ती की कार्यवाही किए जाते समय करवाई गई वीडियोग्राफी यदि अभिलेख पर नहीं थी, तो प्रतिपरीक्षण के दौरान गवाह के बयान रुकवाते हुए वीडियोग्राफी को न्यायालय के समक्ष तलब भी करवाया जा सकता था। जहाँ तक वक्त घटना मूल सिंह भाटी का पुलिस थाना बिलाड़ा में एसएचओ होना बताया गया है और यह प्रकरण पुलिस थाना कापरड़ा से संबंधित है, तो इस प्रकरण में उपलब्ध रिमांड कागजात के अनुसार भी जब सर्वप्रथम दिनांक 02.09.2024 को अभियुक्तगण को संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष रिमांड हेतु पेश किया गया था, तब चुन्नीलाल एसएचओ पीपाड़ शहर की ओर से पेश किया गया था और इसमें भी परिवादी में सरकार जरिये श्री मूल सिंह निरीक्षक पुलिस थानाधिकारी पुलिस थाना बिलाड़ा हाल प्रभारी कापरड़ा उल्लेखित है और जो फर्दें बनाई गईं उनमें भी कापरड़ा/बिलाड़ा उल्लेखित हो रखा है। अतः इस स्थिति में यह स्पष्ट है कि पी.डब्ल्यू.-2 मूल सिंह को, जो कि तत्कालीन समय में थानाधिकारी बिलाड़ा थे, उसको कापरड़ा में भी कार्यवाही करने हेतु उच्च अधिकारियों द्वारा अधिकृत किया गया था, क्योंकि फर्दों में भी पुलिस थाना कापरड़ा/बिलाड़ा जिला जोधपुर ग्रामीण का अंकन हो रखा है।
11. जहाँ तक अधिनियम की धारा 42 के आज्ञापक प्रावधानों का प्रश्न है, तो अधिनियम की धारा 42(1) के अनुसार जहाँ कोई गुप्त सूचना प्राप्त होती है तो उसे लेखबद्ध करते हुए उच्च अधिकारियों को प्रेषित करना होता है और यह स्थिति तब है जब जिस स्थान में प्रवेश कर तलाशी ली जानी हो वहाँ सूर्योदय अथवा सूर्यास्त के मध्य कोई मादक पदार्थ छुपा रखा गया हो, लेकिन जहाँ सूर्यास्त और सूर्योदय के मध्य में कोई तलाशी और जब्ती की कार्यवाही की जाती है तो ऐसे अधिकारी को अपने विश्वास के कारणों को भी अभिलिखित करना होता है और जहाँ कोई गुप्त सूचना प्राप्त होती है उसे धारा 42(2) के तहत उच्च अधिकारियों को भी प्रेषित करना होता है। इस प्रकरण में भी पी.डब्ल्यू.-2 मूल सिंह भाटी की ही साक्ष्य से यह स्पष्ट है कि जब सर्वप्रथम मुखबिर की इत्तला प्राप्त हुई थी, वह दिनांक 01.09.2024 को 10:50 पी.एम. की थी, अर्थात तब तक सूर्यास्त भी हो चुका था। फिर भी इस सूचना को अभिलिखित करते हुए धारा 42(2) अधिनियम के तहत उच्च अधिकारियों को प्रेषित भी किया गया था, जिस पर उच्च अधिकारी की प्राप्ति के हस्ताक्षर भी हैं। अर्थात जो मुखबिर की इत्तला थी वह सर्वप्रथम सूर्यास्त के पश्चात ही प्राप्त हुई थी, जिसे थानाधिकारी मूल सिंह भाटी द्वारा लेखबद्ध करते हुए धारा 42(2) के तहत उच्च अधिकारियों को प्रेषित करते हुए नाकाबंदी हेतु मौके पर मय जाब्ता प्रस्थान किया गया था और तलाशी और जब्ती से पूर्व भी मूल सिंह, निरीक्षक पुलिस द्वारा अपने विश्वास के कारणों को भी लेखबद्ध किया गया था, अर्थात बिना वारंट खाना तलाशी के कारण भी लेखबद्ध किए गए थे। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि सूर्यास्त के पश्चात मुखबिर की इत्तला प्राप्त हुई थी, जिसे लेखबद्ध करते हुए उच्च अधिकारियों को प्रेषित भी किया गया था, जिन पर उनकी प्राप्ति के हस्ताक्षर भी हैं और जब मौके पर सूर्यास्त के बाद तलाशी और जब्ती की कार्यवाही की गई थी, तब पी.डब्ल्यू.02 मूल सिंह भाटी द्वारा बिना वारंट खाना तलाशी के संदर्भ में विश्वास के कारणों को भी अभिलिखित किया गया था। अर्थात् ऐसी स्थिति नहीं है कि सर्वप्रथम मुखबिर की इत्तला प्राप्त होने के बावजूद भी उसे उच्च अधिकारियों को प्रेषित नहीं किया गया हो और सूर्यास्त के पश्चात इत्तला होते हुए भी जब जब्ती और तलाशी की कार्यवाही की गई थी, तब भी विश्वास के कारणों को लेखबद्ध किया गया था, जो कि अभिलेख पर है।
12. इस संबंध में प्रार्थी-अभियुक्त के योग्य अधिवक्ता की ओर से माननीय उच्चतम न्यायालय का जो निर्णय State of Rajasthan v. Jag Raj Singh @ Hansa पेश किया गया है, इसमें प्रतिपादित विधि की स्थिति से सादर सहमत हूँ, क्योंकि उक्त प्रकरण में मुखबिर से प्राप्त इत्तला को लेखबद्ध करने के पश्चात उच्च अधिकारियों को प्रेषित भी नहीं किया गया था। इसी प्रकार से योग्य अधिवक्ता प्रार्थी-अभियुक्त की ओर से Sandeep v. State of Rajasthan एवं Arjun v. State of Rajasthan के निर्णयों की प्रतियां प्रस्तुत की गई हैं, जो कि इस न्यायालय की समकक्ष पीठ के हैं, इसमें भी अधिनियम की धारा 42(1) के आज्ञापक प्रावधानों की पालना नहीं की गई थी। इस प्रकार इस प्रकरण में यह स्थिति नहीं आई है कि जब सर्वप्रथम मुखबिर से इत्तला प्राप्त हुई थी, तो उसे लेखबद्ध करने के पश्चात थानाधिकारी मूल सिंह भाटी द्वारा उच्च अधिकारियों को प्रेषित नहीं किया गया हो, बल्कि उन्हें प्रेषित करने के पश्चात ही मौके पर कार्यवाही हेतु मय जाब्ता प्रस्थान किया गया था। इसी प्रकार से Lalchand v. State of Rajasthan एवं Gumanmal v. State of Rajasthan प्रस्तुत निर्णयों के मामले तो सजा स्थगन के संदर्भ में हैं।
13. जहाँ तक घटनास्थल पर तलाशी और जब्ती की कार्यवाही नहीं किए जाने का प्रश्न है, तो अभिलेख पर यह स्थिति भी आई है कि जिस जगह वाहन को सर्वप्रथम रोका गया, तब चालक ने भगाने का प्रयास किया था और मौके पर बरसात होने व आवागमन अत्यधिक होने की वजह से निकट ही टोल नाके पर ले जाकर तलाशी और जब्ती की कार्यवाही की गई थी और इस स्थिति में इस स्टेज पर यह नहीं माना जा सकता कि इससे प्रार्थी-अभियुक्त का कोई हित प्रभावित हुआ हो, विशेषकर जबकि थाने का एरिया एक ही था और इससे कोई क्षेत्राधिकार परिवर्तित नहीं हुआ था।
14. इस प्रकरण में प्रार्थी-अभियुक्त का दिनांक 02.09.2024 से अभिरक्षा में होना बताया गया है और विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा जो जमानत प्रार्थना पत्र पर आदेश दिया गया था, वह दिनांक 09.12.2025 का है और इस दिन तक पी.डब्ल्यू.-1 अशोक चौधरी, पी.डब्ल्यू.-2 मूल सिंह भाटी के कथन लेखबद्ध हो चुके थे। तब से लेकर अब तक करीब 10 माह से भी अधिक समय तक विद्वान विचारण न्यायालय के समक्ष और कितने गवाहों के कथन लेखबद्ध हो चुके हैं, यह स्थिति स्पष्ट नहीं है। अतः यह नहीं माना जा सकता कि विद्वान विचारण न्यायालय के समक्ष प्रार्थी-अभियुक्त की अन्वीक्षा होने में कोई विलंब हो रहा हो।
15. इस स्थिति में माननीय उच्चतम न्यायालय ने State of Punjab vs. Sukhwinder Singh @ Gora (2026 INSC 411) मामले में स्पष्ट किया है कि व्यावसायिक मात्रा (Commercial Quantity) के एनडीपीएस मामलों में धारा 37 की दोनों “जुड़वा शर्तें” (Twin Conditions) अनिवार्य हैं। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त त्वरित सुनवाई (Speedy Trial) के अधिकार के आधार पर इन कड़े प्रावधानों को कमजोर या नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जब तक अदालत पूरी तरह संतुष्ट न हो कि आरोपी निर्दोष है और जमानत पर छूटने के बाद दोबारा अपराध नहीं करेगा, केवल मुकदमे या गवाहों की पेशी में देरी के नाम पर जमानत नहीं दी जा सकती। साथ ही अभिलेख पर यह भी स्पष्ट है कि पूर्व में प्रार्थी-अभियुक्त के साथ के ही सह-अभियुक्त मनोज कुमार को भी दिनांक 20.12.2024 को इस न्यायालय की समकक्ष पीठ द्वारा अंतरिम जमानत देने पर वह पुनः उपस्थित नहीं होकर फरार हो गया था।
16. जहाँ तक नमूना सैंपल 11 दिन के विलंब से परीक्षण हेतु प्रेषित किए जाने का प्रश्न है, तो इस संबंध में माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्णयों Bharat Aambale v. State of Chhattisgarh: 2025(1) Crimes 137 (SC), Mohan Lal v. State of Rajasthan: AIR 2015 SC 2098, Narcotics Control Bureau v. Kashif: 2024 INSC 1045 में प्रतिपादित स्थिति से जमानत हेतु इस स्तर पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि इससे प्रार्थी-अभियुक्त का कोई हित प्रभावित हुआ हो और जहां सैंपल विलम्ब से प्रेषित किए जाते हैं एवं अधिनियम की धारा 52A के तहत इन्वेंट्री की कार्यवाही विलम्ब से होती है तो इसे अनियमितता ही कहा जा सकता है।
17. इस प्रकार प्रार्थी-अभियुक्त एवं एक अन्य सह-अभियुक्त के कब्जे से 7 किलो 96 ग्राम अवैध अफीम का दूध और एक विदेशी पिस्टल और पाँच जिंदा कारतूस की बरामदगी की गई है, जो कि बरामदशुदा मादक पदार्थ वाणिज्यिक मात्रा से भी अत्यधिक है।
18. अतः उपर्युक्त विवेचन, प्रस्तुत तर्कों, अभिलेख पर उपलब्ध सामग्री, प्रकरण के तथ्यों-परिस्थितियों, अपराध की गंभीरता आदि को दृष्टिगत रखते हुए, इस प्रक्रम पर प्रकरण के गुणावगुण पर कोई विवेचन किए बिना प्रार्थी-अभियुक्त को जमानत का लाभ दिया जाना न्यायोचित प्रतीत नहीं होता है।
19. परिणामतः प्रार्थी-अभियुक्त राकेश की ओर से प्रस्तुत यह द्वितीय जमानत प्रार्थना पत्र अंतर्गत धारा 483 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता खारिज किया जाता है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाता है कि उक्त निष्कर्ष केवल जमानत प्रार्थना-पत्र का निस्तारण करने के ही संदर्भ में दिया गया है और इसका मूल प्रकरण के निर्णय के समय मैरिट पर प्रभाव नहीं रहेगा।
(CHANDRA SHEKHAR SHARMA),J
Rakesh v. State of Rajasthan
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