[2026:RJ-JP:43125]
HIGH COURT OF JUDICATURE FOR RAJASTHAN
BENCH AT JAIPUR
S.B. Civil First Appeal No. 53/2022
CNR: RJHC020058952022 | URN: CFA / 112U / 2022
Surendra Singh Charan ----Appellant
Versus
(1) Nanchi Lal alias Nanchu (2) Panchiu (3) Tofan (since deceased), through his legal heirs, respondents 3/1 to 3/7 (4) Boduram (5) Gopi alias Gopiram (6) Gyarshilal ----Respondents
For Appellant(s): Mr. SJ Gupta, Sr. Adv. assisted by Ms. Surabhi Agarwal, Mr. Anil Kumar Sharma, Mr. Manjeet Sharma
For Respondent(s): Mr. JR Choudhary with Mr. MI Abbasi, Mr. Dinesh
[NyayVidhan notes: Stored from the official Rajasthan High Court PDF of the judgment (hcraj file 200900000532022_27.pdf, 38 pages, uploaded 27.10.2026). (1) The judgment is written in Hindi, with quotations in English. The Hindi text is set in the legacy Kruti Dev font in the PDF and was converted to Unicode Devanagari by NyayVidhan and checked against the rendered pages; the dashes of the print appear as hyphens. Conversion marks were mended: the closing quotation mark (three places), 'ॉ'/'ऑ' in 'क्रॉस', 'ऑब्जेक्शन' (paragraph 6) and 'रिकॉर्ड' (paragraph 25), 'हैं' (paragraph 24, quoted clause), and the date '09.06.2017' divided at a line end (paragraph 25). (2) The Court's own paragraph numbers 1-30 are kept. Quoted matter (the issues in paragraph 4, the Supreme Court and Madras High Court extracts, and clauses 2, 5 and 6 of the agreement and page 5 of the supplementary agreement in paragraphs 23-24) is kept inside the quoting paragraph. The date block before paragraph 1 is numbered 1-4 in the print; it is stored without those numbers. (3) The neutral citation is stored as printed on every page of the PDF, 2026:RJ-JP:43125; the High Court's judgment listing shows 2026:RJ-JP:43669 for this case. (4) The cause title is abridged: the parties' parentage, ages and addresses, and the names and addresses of the legal heirs of respondent 3, are omitted. (5) The text is otherwise as printed, including 'विशिष्ठ' (paragraph 1), 'इकरानामा' and 'इकारारनामा' (several paragraphs), the amount '1,51,000/-' (paragraph 12), 'Deceased by by L.Rs.' (paragraph 10), 'Garuda Chlt' (paragraph 18), 'Civil Apeeal' and 'Transfer of Property Act, 18823' (paragraph 20), 'प्रार्थना पत्र संख्या 6056/2024 ... अंतर्गत धारा 438 भारतीय दंड संहिता' and 'वादी ने सहायक कलेक्टर ... वाद संस्थित किया था' (paragraph 25), and 'दिनांक 08.12.2012 को अखबार में प्रकाशन' (paragraph 26; paragraphs 2, 26 and 27 give 06.12.2012 as the date of the respondents' newspaper notice). (6) Page furniture (QR codes, page numbers, running heads, upload/download stamps, the staff line and the TCPDF line) is removed. The PDF is authoritative.]
[Source: Rajasthan High Court, hcraj.nic.in — judgment dated 27.10.2026.]
HON'BLE MR. JUSTICE CHANDRA PRAKASH SHRIMALI
Judgment
REPORTABLE
Arguments Concluded On: 17.09.2026
Judgment Reserved On: 17.09.2026
Full Judgment/Operative Part Pronounced: Full Judgment
Pronounced On: 27.10.2026
1. अपीलार्थी/वादी की ओर से यह दीवानी प्रथम अपील विद्वान अपर जिला एवं सेशन न्यायाधीश, क्रम 02, जयपुर महानगर द्वितीय द्वारा वाद संख्या 119/2020 (159/2014), सुरेन्द्र सिंह चारण बनाम नानछीलाल उर्फ नन्छू, में पारित आलोच्य निर्णय व डिक्री दिनांक 23.10.2021 से व्यथित होकर प्रस्तुत की गई है, जिसके द्वारा विद्वान विचारण न्यायालय ने अपीलार्थी/वादी का वाद बाबत विशिष्ठ अनुपालना व स्थायी निषेधाज्ञा का खारिज किया है व इकरारनामा व पूरक इकरारनामा के समय जो राशि प्रतिवादी संख्या 1, 3 व 4 ने प्राप्त की थी, वह धनराशि अपीलार्थी/वादी प्राप्त करने का अधिकारी होना माना है। (इस निर्णय में अपीलार्थी/वादी को आगे ’वादी’ तथा प्रत्यर्थीगण/प्रतिवादीगण को ‘प्रतिवादीगण’ के नाम से सम्बोधित किया जाएगा।)
2. वादी ने विद्वान विचारण न्यायालय के समक्ष वादपत्र के पैरा संख्या 1 व 2 में वर्णित कुल 7.71 बीघा भूमि को प्रतिवादीगण से दिनांक 14.08.2012 को विक्रय इकरारनामा के आधार पर 43,00,000/- रुपये प्रति बीघा की दर से क्रय किया जाना और अग्रिम पेटे 31,00,000/- रुपये और पूरक इकरारनामा दिनांक 13.09.2012 के द्वारा प्रतिवादीगण को 1,00,00,000/-रुपये दिया जाना बताया है। वादी का वादपत्र में यह कथन है कि इकरानामा दिनांक 14.08.2012 की पालना में तीन माह के अंदर विक्रय प्रतिफल की शेष संपूर्ण राशि प्रतिवादीगण को अदा करने के लिए तैयार व तत्पर था, लेकिन प्रतिवादीगण ने विक्रय भूमि का सीमांकन व नापजोख शेष होना बताकर और उसी अनुसार विक्रय प्रतिफल राशि प्राप्त करने को कहा। सद्भावी विश्वास के कारण से वादग्रस्त भूमि का शेष प्रतिफल राशि अदा नहीं की जा सकी और उसी उद्देश्य से प्रतिवादीगण ने दिनांक 17.09.2012 को विक्रित भूमि में से खसरा सं. 680 व 684 की भूमि का संपूर्ण कब्जा वादी को दे दिया और जब काश्त करने गया तो प्रतिवादीगण ने उक्त भूमि पर जवाहरा उर्फ जवाहर के विधिक प्रतिनिधि की ओर से न्यायालय से स्थगन लाने और प्रतिवादीगण द्वारा सहायक कलेक्टर आमेर मुख्यालय जयपुर में उक्त भूमि का तकासमा (विभाजन) हेतु दावा करने व वर्ष 2009 से उक्त दावे का लंबित होना बताया है। इस तथ्य को छुपाकर प्रतिवादीगण ने वादग्रस्त भूमि को विवादरहित होना बताकर इकरारनामा व पूरक इकरारनामा निष्पादित कराया। इस पर प्रतिवादीगण ने कहा वादी चिंता नहीं करें और उनके द्वारा राजस्व विवाद निस्तारित करवा लिया जाएगा। भूमि की नापजोख करनी है, उसे वास्तविक रूप से भूमि की स्थिति आने पर विक्रय-पत्र की राशि की गुणांक करने में आसानी होगी। वादी विक्रय प्रतिफल की संपूर्ण राशि को अदा करने के लिए तैयार व तत्पर था, इस संबंध में दिनांक 08.11.2012 को प्रतिवादीगण को नोटिस दिया गया। उसके बाद दिनांक 05.12.2012 को पुन: वादी ने तद्नुरूप प्रतिवादी को नोटिस दिया, जो उन्होंने लेने से उन्होंने इंकार कर दिया। प्रतिवादीगण ने दिनांक 06.12.2012 को दैनिक भास्कर समाचार पत्र में सूचना प्रकाशित करके इकरारनामा निरस्त करवा दिया, जिसका खंडन वादी ने दिनांक 08.12.2012 को दैनिक भास्कर समाचार पत्र में करवाया। प्रतिवादीगण ने वादग्रस्त भूमि पर स्थगन होने का तथ्य छुपाकर इकरारनामा में भूमि को विवादरहित बताकर, भूमि की नापजोख नहीं करवाते हुए वादग्रस्त संपत्ति को धोखाधड़ी करके वादी को बेच दिया। वादी इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 की पालना में शेष बकाया प्रतिफल राशि लेकर विक्रय पत्र रजिस्टर्ड कराने के लिए तैयार व तत्पर था, लेकिन प्रतिवादीगण द्वारा बार-बार टालमटोल व बहानेबाजी करने के कारण से वादग्रस्त भूमि की रजिस्ट्री नहीं करवाई, जिस पर वादी ने दिनांक 02.01.2013 को प्रतिवादीगण के विरुद्ध पुलिस थाना हरमाड़ा में प्रथम सूचना रिपोर्ट संख्या 3/2013 अंतर्गत धारा 418, 420, 406, 120बी भारतीय दण्ड संहिता दर्ज कराई, जिसमें धारा 482 दण्ड प्रक्रिया संहिता में माननीय राजस्थान उच्च न्यायालय में लंबित याचिका में प्रतिवादीगण ने वादी को उक्त भूमि बेचान करने और 1,31,00,000/- रुपये प्राप्त करने का इकरारनामा व पूरक इकरारनामा निष्पादित किए जाने की स्वीकृति दी और उक्त याचिका को माननीय राजस्थान उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया। पुलिस ने प्रतिवादीगण के विरुद्ध संबंधित आरोप प्रमाणित पाकर आरोप पत्र संबंधित न्यायालय में प्रस्तुत किया। इकरारनामा की पालना में प्रतिवादी संख्या 05 गोपीराम उर्फ गोपी ने अपनी पत्नी श्रीमती सुनील देवी के माध्यम से अपनी भूमि विक्रय पत्र वादी की पत्नी सज्जन के नाम रजिस्टर्ड करवाकर कब्जा सुपुर्द कर दिया। ऐसी स्थिति में वादी, प्रतिवादी संख्या 5 गोपीराम उर्फ गोपी के विरुद्ध कोई अनुतोष नहीं चाहता है। गोपीराम उर्फ गोपी के हिस्से को छोड़कर वादपत्र के पैरा संख्या 2 में शेष रही भूमि के संबंध में वादी ने स्वयं अनुतोष चाहा गया। वादपत्र में अंकित अनुतोष के साथ वादी का दावा डिक्री किया जावे।
3. प्रकरण में प्रतिवादी संख्या 1, 3 व 4 व प्रतिवादी संख्या 2 व 6 ने दिनांक 03.03.2015 व प्रतिवादी संख्या 5 ने दिनांक 12.12.2015 को लिखित कथन प्रस्तुत किया।
4. पक्षकारान के अभिवचनों के आधार पर विद्वान् विचारण न्यायालय ने निम्न विवाद्यक विरचित किए :-
"1. आया वादी वादपत्र में वर्णित प्रतिवादीगण संख्या 1 लगायत 4 एवं 6 से क्रयशुदा भूमि बाबत विक्रय इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 की अनुपालना करवाकर मुताबिक इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 में वर्णित भूमि का विक्रय पत्र प्रतिवादीगण सं 1 लगायत 4 एवं 6 से तहरीर तकमील निष्पादित करवा कर अपने हक में पंजीबद्ध करवाने का वैध अधिकारी है? विकल्प में वादी, प्रतिवादीगण सं. 1 लगायत 4 व 6 द्वारा उक्त भूमि का विक्रय पत्र वादी के हक में तहरीर व तकमील निष्पादित कर पंजीबद्ध करवाये जाने पर वादी न्यायालय में बकाया विक्रय प्रतिफल राशि जमा कर विक्रय इकरारनामा दिनांक 14.08.12 की पालना में विक्रयशुदा भूमि का विकय पत्र जरिये न्यायालय अपने हक में तहरीर-तकमील करवा कर पंजीबद्ध करवाने का वैध अधिकारी है ? 2. आया प्रतिवादीगण सं. 1 लगायत 4 व 6 वादपत्र में वर्णित विक्रयशुदा भूमि का बेचान, हस्तान्तरण, रहन, बय अनाधिकृत तौर से दीगर व्यक्ति, संस्था सोसायटी आदि को करके वादी की खरीदशुदा भूमि के कब्जे में विघ्न बाधा उत्पन्न करने पर आमादा है, जिसके विरुद्ध वादी स्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त करने का वैध अधिकारी है ? 3. आया वादी द्वारा विवादित इकरारनामा दिनांक 14.08.12 की पालना में विक्रय इकरारनामा अवधि 3 माह में प्रतिवादीगण को शेष विक्रय राशि अदा नहीं करने एवं प्रतिवादीगण सं. 2 व 6 को इकरारनामा दिनांक 14.08.12 की पालना में विक्रय राशि अदा नहीं करने से वाद कारण उत्पन्न ही नहीं हुआ है। 4. आया वाद, वादी प्रतिवादीगण को विक्रयशुदा भूमि की प्रतिफल राशि 3,22,50,000/- रुपये अन्दर मियाद इकरारनामा दिनांक 14.08.12 अदा नहीं करने पर निरस्तनीय है? 5. आया वाद, वादी पर्याप्त न्यायशुल्क पर प्रस्तुत नहीं होने से निरस्तनीय है? 6. अनुतोष?"
5. वादी ने पीडब्ल्यू 1 से पीडब्ल्यू 3 तक और दस्तावेजी साक्ष्य में प्रदर्श-1 से 34 तक दस्तावेज प्रदर्शित करवाए तथा प्रतिवादीगण की ओर से 3 साक्ष्य परीक्षित करवाए।
6. विद्वान विचारण न्यायालय ने पक्षकारान को सुनकर दिनांक 23.10.2021 को निर्णय पारित कर विवाद्यक संख्या 1 व 2 वादी के विरुद्ध, विवाद्यक संख्या 3 व 4 प्रतिवादीगण के पक्ष में, विवाद्यक संख्या 5 प्रतिवादी संख्या 2 व 6 के विरुद्ध निर्णीत किया। विवाद्यक संख्या 1 से 4 में जो वादी के विरुद्ध विद्वान विचारण न्यायालय ने निर्णित किया है, उससे व्यथित होकर वादी की ओर से प्रथम अपील प्रस्तुत की गई है। प्रतिवादीगण की ओर से क्रॉस अपील या क्रॉस ऑब्जेक्शन प्रस्तुत नहीं की गई है।
7. अपील पर उभय पक्षों को सुना गया एवं पत्रावली का अवलोकन किया।
8. वादी के विद्वान अभिभाषक का बहस के दौरान यह कथन रहा है कि दोनों पक्षों में यह स्वीकृत स्थिति है कि दिनांक 14.08.2012 को वादग्रस्त संपत्ति के विक्रय के संबंध में इकरारनामा वादी व प्रतिवादीगण के मध्य निष्पादित किया गया था। उसकी अनुपालना दिनांक 13.09.2012 को पूरक इकरारनामा निष्पादित किया गया था। पक्षकारान के अभिवचनों व प्रस्तुत दस्तावेजों से यह स्वीकृत स्थिति है कि प्रतिवादीगण द्वारा वादग्रस्त संपत्ति के विक्रय करने का इकरार करके 31,00,000/- रुपये अग्रिम और तत्पश्चात् 1,00,00,000/-रुपये पूरक इकरारनामा के अनुरूप, कुल 1,31,00,000/-रुपये प्राप्त कर लिए गए। इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 की पालना में शेष प्रतिफल राशि तीन माह में अदा किया जाना इकरारनामा में लिखा गया था और वादी इकरारनामा की पालना में संपूर्ण प्रतिफल राशि प्रतिवादीगण को अदा करने के लिए तैयार व तत्पर था, लेकिन प्रतिवादीगण ने भूमि की नापजोख किए जाने में समय लगने, वादग्रस्त भूमि के संबंध में प्रतिवादीगण ने वादग्रस्त भूमि के विभाजन का वाद राजस्व न्यायालय में लंबित होने व रजिस्टर्ड विक्रय पत्र निष्पादित करने के संबंध में राजस्व न्यायालय का स्थगन आदेश होने का कहकर वादग्रस्त भूमि का पंजीकृत विक्रय-पत्र निष्पादित नहीं करवाया, जबकि वादी शेष प्रतिफल राशि प्रतिवादीगण को अदा करके वादग्रस्त भूमि की रजिस्ट्री अपने पक्ष में करवाने के तैयार व तत्पर था और जब प्रतिवादीगण की ओर से शेष प्रतिफल की राशि प्राप्त करने में आनाकानी की तो दिनांक 08.11.2012 को वादी ने शेष विक्रय प्रतिफल राशि प्राप्त कर विक्रय पत्र पंजीयन कराने का प्रतिवादीगण को नोटिस दिया तथा पुन: नोटिस दिनांक 05.12.2012 को भिजवाया, जिससे प्रतिवादीगण ने लेने से इंकार कर दिया और प्रतिवादीगण ने दैनिक भास्कर समाचार पत्र में सूचना प्रकाशित करके वादी पर यह आरोप लगाया कि नियत अवधि में शेष राशि का भुगतान नहीं करने के कारण से इकरारनामा निरस्त कर दिया गया है। इस प्रकार वादी ने दिनांक 08.12.2012 को दैनिक समाचार पत्र दैनिक भास्कर में इस सूचना का खंडन करवाया और यह कहा कि विक्रय प्रतिफल की बड़ी राशि का भुगतान किए जाने और एक हिस्सा खसरा संख्या 680 व 684 का कब्जा प्राप्त किए जाने के पश्चात् व शेष प्रतिफल राशि अदा करने के लिए तैयार व तत्पर है। प्रतिवादीगण के द्वारा विक्रय की गई राशि को पाकर रजिस्ट्री से इंकार कर धोखाधड़ी करने के कारण से वादी ने दिनांक 02.01.2013 को पुलिस थाना हरमाड़ा में प्रतिवादीगण के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवाई, जिसमें पुलिस ने अनुसंधान कर प्रतिवादीगण के विरुद्ध आरोपित अपराध संदेह से परे साबित होना माना तो प्रथम सूचना रिपोर्ट की कार्यवाही को निरस्त करने के लिए प्रतिवादीगण ने धारा 482 दण्ड प्रक्रिया संहिता के तहत एक याचिका संख्या 205/2013 माननीय राजस्थान उच्च न्यायालय में प्रस्तुत की, जिसमें उसने वादी से 1,31,00,000/- रुपये प्राप्त किया जाना स्वीकार किया। वादी के द्वारा प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने के कारण से प्रतिवादी संख्या 5 गोपी उर्फ गोपीराम ने वादग्रस्त भूमि में अपने हिस्से का वादी की पत्नी सज्जन के नाम पंजीकृत कराकर कब्जा सुपुर्द कर दिया। ऐसी स्थिति में वादग्रस्त भूमि का पुराना खसरा संख्या 124 नई 143 में 1/24, खाता संख्या पुराना 105 नई 123 में हिस्सा 1/40 एवं खाता संख्या पुराना 105 नई 124 में हिस्सा 1/40 पर विवाद समाप्त हो चुका है। यदि वादी वादग्रस्त संपत्ति का शेष विक्रय प्रतिफल राशि प्राप्त करने का इच्छुक नहीं होता तो वह 40 प्रतिशत से अधिक विक्रय प्रतिफल राशि 1,31,00,000/- रुपये प्रतिवादीगण को क्यों देता। यदि वादी शेष विक्रय प्रतिफल राशि अदा करने के लिए तैयार व तत्पर नहीं होता तो प्रतिवादीगण को पंजीकृत नोटिस वादी को देना चाहिए था। यदि वादी, प्रतिवादीगण के विरुद्ध शेष विक्रय प्रतिफल राशि अदा नहीं करता तो यह माना जाता कि वादी शेष स्वीकृत प्रतिफल राशि अदा करने के लिए तैयार व तत्पर नहीं था, लेकिन प्रतिवादीगण द्वारा वादग्रस्त भूमि के संबंध में वादी द्वारा दी गई 1,31,00,000/- रुपये हड़पने के उद्देश्य से वादग्रस्त भूमि का विक्रय नहीं कर प्रतिवादीगण ने सीधे ही दैनिक समाचार पत्र में दिनांक 06.12.2012 को समाचार पत्र प्रकाशित करवाकर इकरारनामा निरस्त कर दिया, जिसका जवाब दैनिक समाचार पत्र दैनिक भास्कर में खंडन कर वादी ने प्रकाशित किया तथा रजिस्टर्ड नोटिस प्रतिवादीगण को भेजा। यदि वादग्रस्त भूमि का शेष विक्रय प्रतिफल राशि देने का आशय वादी का नहीं होता तो समाचार पत्र में प्रकाशित करके व प्रतिवादीगण को नोटिस भेजकर, वह क्यों आवश्यक कार्यवाही करता। इकरारनामा में अंकित समय सीमा संविदा का सार है या नहीं, ये समस्त तथ्य, प्रकरण के तथ्यों व परिस्थितियों, पक्षकारान के आचरण को दृष्टिगत रखते हुए निर्धारित की जाती है। इस प्रकरण में प्रतिवादीगण का आचरण वादग्रस्त संपत्ति की रजिस्ट्री करवाने का नहीं था, प्राप्त किए गए प्रतिफल राशि 1,31,00,000/- रुपये को हड़पने का था, जिसके संबंध में वादी ने प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवाई और पुलिस ने भी इस तथ्य को माना कि प्रतिवादीगण ने धोखाधड़ी की है। ऐसी स्थिति में विद्वान विचारण द्वारा पारित आलोच्य निर्णय दिनांक 23.10.2021 को अपास्त किया जाकर वादी का दावा अनुतोष के अनुरूप पारित किया जावे।
9. प्रतिवादीगण के विद्वान अभिभाषक का कथन है कि विक्रय इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 की पालना में इकरारनामा की शर्त संख्या 2, 5 व 6 के अनुसार वादी को इकरारनामा की दिनांक से तीन माह के भीतर संपूर्ण प्रतिफल राशि दिनांक 14.11.2012 तक अदा की जानी थी, लेकिन इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 के अनुसार वादी शेष विक्रय प्रतिफल राशि अदा नहीं की। उसके संबंध में प्रतिवादीगण ने वादी को नोटिस दिया और समाचार पत्र में प्रकाशन करके इकरारनामा के तय समय सीमा में शेष प्रतिफल राशि अदा नहीं करने के कारण से इकारारनामा निरस्त कर दिया और वादी द्वारा अग्रिम साई पेटे दी गयी राशि 1,31,00,000/- रुपये इकरारनामे में वर्णित शर्तों के अनुसार जब्त कर लिये। इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 व पूरक इकरारनामा दिनांक 13.09.2012 में प्रतिवादी संख्या-02 पांची व प्रतिवादी-06 ग्यारसीलाल उपस्थित नहीं थे, न ही उन्होंने कोई इकरारनामा में वर्णित राशि प्राप्त की। ऐसी स्थिति में इकरारनामा व पूरक इकरारनामा में अंकित सम्पत्ति में प्रतिवादी संख्या 02 व 06 के हिस्से की जमीन को वादी प्राप्त करने का अधिकारी नहीं है। इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 की अनुपालना में नियत अवधि तीन माह के अंतर्गत वादी ने संपूर्ण प्रतिफल राशि प्राप्त करने का प्रयास नहीं किया और न ही तैयार व तत्पर था और ऐसी स्थिति में इकरारनामा में वर्णित समय सीमा को दृष्टिगत रखते हुए प्रतिवादीगण ने इकरारनामा को निरस्त कर वादी द्वारा दिये गये 1,31,00,000/-रुपये जब्त कर लिये व माननीय राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा धारा 482 दंड प्रक्रिया संहिता की याचिका में पारित आदेश दिनांक 15.07.2014 की अनुपालना में जरिये डीडी दिनांक 21.07.2014 को प्राप्त राशि प्रतिवादीगण ने महानगर मजिस्ट्रेट संख्या 25, चौमूं जयपुर महानगर में जमा करवा दिये। प्रतिवादी संख्या 05 गोपी उर्फ गोपीराम को दबाव में लेकर वादी ने कोई दस्तावेज पंजीबद्ध करवाये हैं तो उसके लिए प्रतिवादीगण बाध्य नहीं है। संविदा में समय महत्वपूर्ण होता है। वादी द्वारा शेष प्रतिफल राशि तैयार व तत्पर नहीं होने के कारण इकरारनामा में वर्णित शर्तों की पालना में सही रूप से प्रतिवादीगण ने इकरारनामा निरस्त कर वादी द्वारा अदा की गयी विक्रय राशि को जब्त किया है। इस संबंध में विचारण न्यायालय द्वारा विस्तृत रूप से मौखिक व दस्तावेजी साक्ष्य का अवलोकन कर आलोच्य निर्णय दिनांक 23.10.2021 पारित किया है, इस पर हस्तक्षेप किये जाने का कोई न्यायसंगत उचित आधार नहीं है। अत: वादी की अपील अस्वीकार कर खारिज किया जावे।
10. प्रतिवादीगण ने अपने तर्कों में समर्थन में निम्न न्यायिक दृष्टांत प्रस्तुत किये हैं:-
1- 2010 AIR SCW 6219, Kammana Sambamurthy (Deceased by by L.Rs.) vs Kalipatnapu Atchutamma (Deceased by by L.Rs.) & Ors,
2- 2019(2) WLC (SC) Civil 345, SCI, Hari Steel And General Industries Ltd & Anr. vs Daljit Singh & Ors.
3- 2011 AIR SCW 4092, Saradamani Kandappan vs S. Rajalakshmi & Ors.
4- 2010 DNJ (SC) 1157 SCI, Man Kaur (Dead) by Lrs vs Hartar Singh Sangha.
11. उभय पक्षों के तर्कों पर मनन किया गया व पत्रावली का अवलोकन किया गया।
12. इस प्रकरण में विचारण न्यायालय ने दिनांक 23.10.2021 को निर्णय पारित कर विवाद्यक संख्या 01 से 04 को वादी के विरुद्ध निर्णीत किया है। दोनों पक्षों द्वारा प्रस्तुत किये गये मौखिक एवं दस्तावेजी साक्ष्य से यह तथ्य स्वीकृत रूप से सामने आता है कि दोनों पक्षों के मध्य वादग्रस्त सम्पत्ति के संबंध में इकारारनामा दिनांक 14.08.2012 को व पूरक इकरारनामा दिनांक 13.09.2012 को निष्पादित हुआ। दोनों पक्षों में यह तथ्य भी स्वीकृत है कि इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 की पालना में प्रतिवादीगण द्वारा जरिए प्रदर्श 02 रसीद में वादग्रस्त भूमि का 43,00,000/- रुपये प्रति बीघा के भाव से साई पेटे 1,51,000/- रुपये प्राप्त करना जाहिर किया। प्रदर्श 01 इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 व पूरक इकरारनामा दिनांक 13.09.2012 में प्रतिवादी संख्या 02 पांची व प्रतिवादी संख्या 06 ग्यारसीलाल के हस्ताक्षर नहीं हैं। उन्होंने वादग्रस्त संपत्ति में अपने हिस्से की संपत्ति का विक्रय किया हो और विक्रय इकरारनामा के आधार पर प्रदर्श 02 रसीद के माध्यम से रसीद प्राप्त की हो, यह तथ्य इस प्रकरण में स्पष्ट नहीं होता है। वादी द्वारा प्रस्तुत मुख्य दस्तावेजी साक्ष्य में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि प्रतिवादीगण संख्या 2 पांची व प्रतिवादी संख्या 6 ग्यारसीलाल ने वादग्रस्त संपत्ति में अपने हिस्से की भूमि का विक्रय, वादी के पक्ष में इकरारनामा या पूरक इकरारनामा निष्पादित किया हो और उसके पेटे विक्रय प्रतिफल राशि 1,31,00,000/-रुपये में से कोई भी राशि प्राप्त की हो। प्रदर्श-01 इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 व पूरक इकरारनामा दिनांक 13.09.2012 व प्रदर्श-02 रसीद पर प्रतिवादी संख्या 02 व 06 के हस्ताक्षर नहीं हैं। वादी द्वारा इस तथ्य को साफ नहीं किया गया है कि प्रतिवादी संख्या 02 पांची व प्रतिवादी संख्या 06 ग्यारसीलाल ने वादग्रस्त संपत्ति में अपनी भूमि का बेचान करने का इकरारनामा वादी को किया हो और इस पेटे कुछ प्रतिफल राशि प्राप्त की हो, ऐसी स्थिति में उपरोक्त साक्ष्य के आधार पर वादी, प्रदर्श-01 इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 व पूरक इकरारनामा दिनांक 13.09.2012 में वर्णित शर्तों के आधार पर वादग्रस्त भूमि में से प्रतिवादी संख्या 02 पांची व 06 ग्यारसीलाल के हिस्से की भूमि को प्राप्त करने के अधिकारी नहीं है।
13. इस प्रकरण में दोनों पक्षों के मध्य यह स्वीकृत स्थिति है कि वादग्रस्त भूमि के विक्रय के संबंध में दोनों पक्षों के मध्य इकरारनामा निष्पादित हुआ और विक्रय प्रतिफल फलस्वरूप 43,00,000/- रुपये का प्रति बीघा की दर से वादग्रस्त भूमि को बेचने का इकरारनामा प्रतिवादी संख्या 02 व 06 के अलावा शेष प्रतिवादीगण से किया था और इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 के अनुरूप 31,00,000/-रुपये प्रतिवादी संख्या 2 व 6 के अतिरिक्त अन्य प्रतिवादीगण ने प्राप्त कर लिए थे और पूरक इकरारनामा दिनांक 13.09.2012 के अनुरूप 1,00,00,000/-रुपये, इस प्रकार कुल 1,31,00,000/-रुपये प्रतिवादी संख्या 2 व 6 के अतिरिक्त अन्य प्रतिवादीगण द्वारा प्राप्त कर लिए गए। इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 के अनुसार तीन माह में शेष प्रतिफल राशि वादी को प्रतिवादीगण को अदा किए जाने पर वादग्रस्त भूमि की रजिस्ट्री करवानी थी। जहां वादी का कथन है कि शेष प्रतिफल की राशि प्रतिवादीगण को अदा करने के लिए तैयार व तत्पर था, वहीं दूसरी तरफ से प्रतिवादी का कथन है कि वादी द्वारा विक्रय के प्रतिफलस्वरूप शेष प्रतिफल राशि दिनांक 14.08.2012 से तीन माह के भीतर जमा नहीं कराने के कारण से इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 की पालना में उन्होंने विक्रय इकरारनामा निरस्त कर शेष अदा की गई विक्रय प्रतिफल राशि को जब्त कर लिया, क्योंकि वादी वादग्रस्त भूमि की शेष प्रतिफल राशि अदा करने के लिए निर्धारित समयावधि में तैयार व तत्पर नहीं था।
14. इस प्रकरण में मुख्य विचारणीय बिंदु यह है कि क्या किसी इकरारनामा में निर्धारित समयावधि में शेष विक्रय प्रतिफल राशि अदा करने के लिए दोनों पक्षों द्वारा कोई संविदा या इकरार किया गया हो और उस निर्धारित अवधि में शेष विक्रय प्रतिफल राशि अदा नहीं की गई हो, तो क्या प्रतिवादीगण इकरारनामा को निरस्त करवाकर क्रेता द्वारा अदा की गई राशि को विक्रेता जब्त करने का अधिकारी है और क्या इकरारनामा में वर्णित समय संविदा का सार है?
15. इस संबंध में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा निम्न विनिश्चयों एवं सिद्धांत को यहां उल्लेखित किया जाना न्यायसंगत व उचित प्रतीत होता है-
(1993) 1 Supreme Court of India 519, Chand Rani (SMT) (DEAD) BY LRS. Vs Kamal Rani (SMT) (DEAD) BY LRS.
"18. Having regard to the above submissions only two points require to be considered by us. (1) Whether time is the essence of the contract ? (2) Whether the first plaintiff was ready and willing to perform the contract ? 19. It is a well-accepted principle that in the case of sale of immovable property, time is never regarded as the essence of the contract. In fact, there is presumption against time being the essence of the contract.This principle is not in any way different from that obtainable in England. Under the law of equity which governs the rights of the parties in the case of specific performance of contract to sell real estate, law looks not at the letter but at the substance of the agreement. It has to be ascertained whether under the terms of the contract the parties named a specific time within which completion was to take place, really and in substance it was intended that it should be completed within a reasonable time. An intention to make time the essence of the contract must be expressed in unequivocal language. 20. We will now refer to the decisions of this Court. In Gomathinayagam Pillai case [1967 (1) SCR 227 : 1967 AIR(SC) 868] it was held at pages 231 to 233
"...Section 55 of the Contract Act which deals with the consequence of failure to perform an executory contract at or before the stipulated time provides by the first paragraph: 'When a party to a contract promises to do a certain thing at or before a specified time, or certain things at or before specified times, and fails to do any such thing at or before the specified time, the contract, or so much of it as has not been performed, becomes voidable at the opinion of the promise if the intention of the parties was that time should be of the essence of the contract. 'It is not merely because of specification of time at or before which the thing to be done under the contract is promised to be done and default in compliance therewith, that the other party may avoid the contract. Such an option arises only if it is intended by the parties that time is of the essence of the contract. Intention to make time of the essence, if expressed in writing, must be in language which is unmistakable: it may also be inferred from the nature of the property agreed to be sold, conduct of the parties and the surrounding circumstances at or before the contract. Specific performance of a contract will ordinarily be granted, notwithstanding default in carrying out the contract within the specified period, if having regard to the express stipulations of the parties, nature of the property and the surrounding circumstances, it is not inequitable to grant the relief. If the contract relates to sale of immovable property, it would normally be presumed that time was not of the essence of the contract. Mere incorporation in the written agreement of a clause imposing penalty in case of default does not by itself evidence an intention to make time of the essence. In Jamshed Khodaram Irani v. Burjorji Dhunjibhai [ILR 40 Bom 289 ] the Judicial Committee of the Privy Council observed that the principle underlying Section 55 of the Contract Act did not differ from those which obtained under the law of England as regards contracts for sale of land. The Judicial Committee observed: 'Under that law equity, which governs the rights of the parties is cases of specific performance of contracts to sell real estate, looks not at the letter but at the substance of the agreement in order to ascertain whether the parties, notwithstanding that they named a specific time within which completion was to take place, really and in substance intended more than that it should take place within a reasonable time.... Their Lordships are do opinion that this is the doctrine which the section of Indian Statute adopts and embodies in reference to sales of land. It may be stated concisely in the language used by Lord Cairns in Tilley v. Thomas" The construction is, and must be, in equity the same as in a Court of law. A Court of equity will indeed relieve against, and enforce, specific performance, notwithstanding a failure to keep the dates assigned by the contract, either for completion, or for the steps towards completion, if it can do justice between the parties, and if (as Lord Justice Turner said in Roberts v. Berry there is nothing in the 'express stipulation between the parties, the nature of the property, or the surrounding circumstances' which would make it inequitable to interfere with and modify the legal right. This is what is meant, and all that is meant, when it is said that in equity time is not of the essence of the contract. Of the three grounds... mentioned by Lord Justice Turner 'express stipulations' requires no comment. The 'nature of property' is illustrated by the case of reversions, mines, or trades. The 'surrounding circumstances' must depend on the facts of each particular case."
"Their Lordships will add to the statement just quoted these observations. The special jurisdiction of equity to disregard the letter of the contract in ascertaining what the parties to the contract are to be taken as having rally and in substance intended as regards the time of its performance may be excluded by any plainly expressed stipulation. But to have this effect the language of the stipulation must show that the intention was to make the rights of the parties depend on the observance of the time-limits prescribed in a fashion which is unmistakable. The language will have this effect if it plainly excludes the notion that these time-limits were of merely secondary importance in the bargain, and that to disregard them would be to disregard nothing that lay as its foundation. 'Prima facie, equity treats the importance of such time-limits as being subordinate to the main purpose of the parties, and it will enjoin specific performance notwithstanding that from the point of view of a court of law the contract has not been literally performed by the plaintiff as regards the time-limit specified.'" 21. In Govind Prasad Chaturvedi v. Hari Dutt Shastri following the above ruling it was held at page 543-544 : (SCC para 5)
"....It is settled law that the fixation of the period within which the contract has to be performed does not make the stipulation as to time the essence of the contract. When a contract relates to sale of immovable property it will normally be presumed that the time is not the essence of the contract. [Vide Gomathinayagam Pillai v. Pallaniswami Nadar (at p. 233).] It may also be mentioned that the language used in the agreement is not such as to indicate in unmistakable terms that the time is of the essence of the contract. The intention to treat time as the essence of the contract may be evidenced by circumstances which are sufficiently strong to displace the normal presumption that in a contract of sale of land stipulation as to time is not the essence of the contract." 22. In Hind Construction Contractors case quoting Halsbury's Laws of England, this Court observed at pages 1154-55 as under : (SCC pp. 76- 77, paras 7 & 8)
"In the latest 4th edn. of Halsbury's Laws of England in regard to building and engineering contracts the statement of law is to be found in Vol. 4, Para 1179, which runs thus: '1179. Where times is of the essence of the contract. - The expression time is of the essence means that a breach of the condition as to the time for performance will entitle the inconstant party to consider the breach as a repudiation of the contract. Exceptionally, the completion of the work by a specified date may be a condition precedent to the contractor's right to claim payment. The parties may expressly provide that time is of the essence of the contract and where there is power to determine the contract on a failure to complete by the specified date, the stipulation as to time will be fundamental. Other provisions of the contract may, on the construction of the contract, exclude an inference that the completion of the works by a particular date is fundamental; time is not of the essence where sum is payable for each week that the work remains incomplete after the date fixed, nor where the parties contemplate a postponement of completion. Where time has not been mad of the essence of the contract or, by reason of waiver, the time fixed has ceased to be applicable, the employer may be notice fix a reasonable time for the completion of the work and dismiss the contractor on a failure to complete by the date so fixed.' It will be clear from the aforesaid statement of law that even where the parties have expressly provided that time of the essence of the contract such a stipulation will have to be read along with other provisions of the contract and such other provisions may, on construction of the contract, exclude the inference that the completion of the work by a particular date was intended to be fundamental; for instance, if the contract were to include clause providing for extension of time in certain contingencies or for payment of fine or penalty for every day or week the work undertaken remains unfinished on the expiry of the time provided in the contract such clause would be construed as rendering ineffective the express provision relating to the time being of the essence of contract. The emphasis portion of the aforesaid statement of law is based on Lamprell v. Billericay Union [(1849) 2 Exch 283, 308];Webb v. Hughes [(1870) LR 10 Eq 281] and Charles Rickards Ltd. v. Oppenheim." 23. In Indira Kaur (Smt) v. Sheo Lal Kapoor in paragraph 6 it was held as under :
"The law is well-settled that in transactions of sale of immovable properties, time is not the essence of the contract." 24. For this proposition reliance was placed on Govind Prasad Chaturvedi case quoted above 25. From an analysis of the above case-law it is clear that in the case of sale of immovable property there is no presumption as to time being the essence of the contract. Even if it is not of the essence of the contract the court may infer that it is to be performed in a reasonable time if the conditions are evident: 1. From the express terms of the contract; 2. from the nature of the property; and 3. from the surrounding circumstances, for example : the object of making the contract."
16. संविदा की विनिर्दिष्ट अनुपालना के वाद में समय संविदा का सार कब हो सकता है और कब नहीं, इस संबंध में विधिक स्थिति व उपरोक्त विनिश्चय को दृष्टिगत रखते हुए देखें तो यह स्पष्ट है कि अचल संपत्ति के विक्रय के मामले में समय के संविदा के सार होने की उपधारणा तो नहीं की जाती है और समय संविदा का सार है अथवा नहीं, या संविदा की स्पष्ट शर्तों, सम्पत्ति की प्रकृति और अन्य मामलों की परिस्थितियों से देखा जाता है कि संविदा समय का सार है अथवा नहीं। पक्षकारों के इकरार करते समय के आशय पर भी यह निर्भर करता है कि समय संविदा का सार है अथवा नहीं। इस संबंध में उक्त विनिश्चय के पैरा संख्या 29 में यह स्पष्ट किया है कि :-
"Therefore, we conclude that though as a general proposition of law time is not the essence of the contract in the case of a sale of immovable property yet the parties intended to make time as the essence under clause (1) of the suit agreement. From this point of view, we are unable to see how the case in Nathulal could have any application to the facts of this case."
17. अचल संपत्ति के विक्रय के संव्यवहार के संबंध में समय संविदा का सार नहीं होता है, इस तथ्य को Indira Kaur (Smt) v. Sheo Lal Kapoor (1988) 2 SCC Page 488 Para 6 में माननीय उच्चतम न्यायालय ने निम्न प्रकार प्रतिपादित किया है:-
"The law is well-settled that in transactions of sale of immovable properties, time is not the essence of the contract."
18. समय संविदा का सार है या नहीं, यह तथ्य पक्षकार के आशय पर निर्भर करता है। इस तथ्य को (2011) 8 SCC Page 601 Coromandel Indage Products Pvt. Ltd. Vs. Garuda Chlt & Trading Co. Pvt. Ltd. & Anr. में माननीय उच्चतम न्यायालय ने निम्न प्रकार प्रतिपादित किया है कि-
"Whether time is the essence of the contract or not can be gathered only by the intention of the parties."
19. उपरोक्त विनिश्चयों में अभिनिर्धारित सिद्धांत के अनुसार समय संविदा का सार है अथवा नहीं, इसके लिए इकरारनामा में वर्णित शर्तों, इकरारनामा की पालना के लिए पक्षकार तैयार है अथवा नहीं, इन तथ्यों और उनके आशय, उनकी सद्भावना तथा विभिन्न तथ्यों एवं परिस्थितियां, न्यायालय को विचार करना होता है कि विशेष प्रकरण में समय संविदा का सार है अथवा नहीं।
20. इस प्रकरण में यह स्थिति भी सामने आती है कि वादी ने प्रदर्श 01 दिनांक 14.08.2012 व पूरक इकरारनामा दिनांक 13.09.2012 की अनुपालना में 1,31,00,000/- रुपये अदा कर दिए थे और शेष राशि इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 की पालना में तीन माह में अदा की जानी थी। ऐसी स्थिति में यह स्पष्ट है कि विक्रय इकरार की पालना में कुछ प्रतिफल राशि प्रतिवादीगण द्वारा प्राप्त की जा चुकी थी और कुछ प्रतिफल राशि वादी से प्रतिवादीगण को प्राप्त करके विक्रय पत्र निष्पादित किया जाना था, शेष विक्रय प्रतिफल राशि वादी द्वारा प्रतिवादीगण को नियत समयावधि में अदा नहीं किए जाने के कारण से क्या प्रतिवादीगण इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 को निरस्त करवाने का अधिकारी है। इस संबंध में निम्न विनिश्चय को अभिनिर्धारित सिद्धांत द्वारा उल्लेखित किया जाना न्यायोचित होगा:-
Raziya Begum and Others vs Nafisa Begum Abdul Hamid and Others, SCI Civil Apeeal No. 7225/2011, Dated 07.08.2026.
"10. In Vidhyadhar (supra), it was held so in Paragraph Nos. 36, 37 and 38 with respect to Section 54 of the Transfer of Property Act, 18823:—
“36. The definition indicates that in order to constitute a sale, there must be a transfer of ownership from one person to another, i.e., transfer of all rights and interests in the properties which are possessed by that person are transferred by him to another person. The transferor cannot retain any part of his interest or right in that property or else it would not be a sale. The definition further says that the transfer of ownership has to be for a “price paid or promised or part-paid and part-promised”. Price thus constitutes an essential ingredient of the transaction of sale. The words “price paid or promised or part-paid and part-promised” indicate that actual payment of the whole of the price at the time of the execution of sale deed is not a sine qua non to the completion of the sale. Even if the whole of the price is not paid but the document is executed and thereafter registered, if the property is of the value of more than Rs. 100, the sale would be complete. 37. There is a catena of decisions of various High Courts in which it has been held that even if the whole of the price is not paid, the transaction of sale will take effect and the title would pass under that transaction. To cite only a few, in Gayatri Prasad v. Board of Revenue [1973 All LJ 412] it was held that non-payment of a portion of the sale price would not affect validity of sale. It was observed that part-payment of consideration by the vendee itself proved the intention to pay the remaining amount of the sale price. To the same effect is the decision of the Madhya Pradesh High Court in Sukaloo v. Punau [AIR 1961 MP 176 : ILR 1960 MP 614]. 38. The real test is the intention of the parties. In order to constitute a “sale”, the parties must intend to transfer the ownership of the property and they must also intend that the price would be paid either in praesenti or in future. The intention is to be gathered from the recital in the sale deed, the conduct of the parties and the evidence on record.” 11. Dahiben (supra) also, while interpreting Section 54 of the Act, held that actual payment of entire sale price at the time of execution of sale deed is not an essential condition for completion of sale. When a sale deed is registered, even upon part payment of the sale price, title would pass to the transferee. The non-payment of remaining part of the sale price would not invalidate it and the remedy would be to recover the balance sale consideration, but not cancellation of sale deed for non-payment of balance sale consideration. 14. Even if we understand the High Court having not entered into a reappreciation of facts, it is clear that the conclusion on the available facts was wrong. The sale deed executed with full knowledge of the part consideration alone having been passed, cannot be rendered void or inoperative merely because the balance consideration promised to be paid, which promise was incorporated in the sale deed, had not been complied with. The right of the plaintiffs was to file for recovery of balance sale consideration and not to seek declaration that the sale deeds were null and void; which they are not."
21. इसी प्रकार (2009) 4 SCC 193, Kaliaperumal vs Rajagopal & Anr के पैरा संख्या 17 व 18 को यहां उल्लेखित किया जाना न्यायोचित होगा:-
"17. It is now well settled that payment of entire price is not a condition precedent for completion of the sale by passing of title, as Section 54 of Transfer of Property Act, 1882 (`Act' for short) defines `sale' as a transfer of ownership in exchange for a price paid or promised or part paid and part promised. If the intention of parties was that title should pass on execution and registration, title would pass to the purchaser even if the sale price or part thereof is not paid. In the event of non- payment of price (or balance price as the case may be) thereafter, the remedy of the vendor is only to sue for the balance price. He cannot avoid the sale. He is, however, entitled to a charge upon the property for the unpaid part of the sale price where the ownership of the property has passed to the buyer before payment of the entire price, under Section 55(4)(b) of the Act. 18. Normally, ownership and title to the property will pass to the purchaser on registration of the sale deed with effect from the date of execution of the sale deed. But this is not an invariable rule, as the true test of passing of property is the intention of parties. Though registration is prima facie proof of an intention to transfer the property, it is not proof of operative transfer if payment of consideration (price) is a condition precedent for passing of the property."
22. उपरोक्त विनिश्चयों से अभिनिर्धारित सिद्धांत के अनुसार यदि पक्षकारों का आशय भूमि का विक्रय कर पंजीकृत विक्रय पत्र निष्पादित करने का है तो ऐसी स्थिति में यदि प्रतिफल राशि या उसका संपूर्ण व आंशिक भाग भी अदा नहीं किया है तो भी धारा 54 संपत्ति अंतरण अधिनियम के अंतर्गत भूमि का विक्रय माना जावेगा तथा विक्रेता भूमि के विक्रय या रजिस्ट्री से इंकार नहीं कर सकता है व शेष प्रतिफल राशि केवल वसूल करने की कार्यवाही कर सकता है।
23. इस प्रकरण में उपरोक्त विनिश्चय में निर्धारित सिद्धांत को दृष्टिगत रखते हुए न्यायालय को इस तथ्य पर विचार करना है कि क्या समय संविदा का सार है अथवा नहीं? सद्भावना के आधार पर वादी शेष प्रतिफल राशि निर्धारित समयावधि में देने के लिए तैयार व तत्पर था या नहीं तथा क्या विधिक स्थिति में प्रतिवादीगण इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 की पालना में निर्धारित अवधि में शेष प्रतिफल राशि अदा नहीं होने के कारण विक्रय इकरारनामा निरस्त कराकर अदा की गई राशि को जब्त करने का अधिकारी था? इस संबंध में इकरारानामा की शर्त संख्या 2, 5, 6 को यहां उल्लेखित किया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है :-
"शर्त संख्या - 2 यह कि प्रथम पक्ष व द्वितीय पक्ष के मध्य तैय हुआ है कि शेष मूल्यधन की राशि में से एक करोड़ रुपये दिनांक 15 सितम्बर सन 2012 तक प्रथम पक्ष द्वितीय पक्ष से और प्राप्त कर लेंगे। इसके पश्चात शेष मूल्यधन की राशि इकरारनामे पर अपने हस्ताक्षर करते समय से अन्दर मियाद तीन माह में द्वितीय पक्ष अपने हित में या अपने द्वारा मनोनित व्यक्ति के हित में उक्त वर्णित अनुबन्धित की गई कृषि भूमि के विकय पत्र की रजिस्ट्री कराते समय प्रथम पक्ष को अदा कर देगा। शर्त संख्या- 5 यह कि द्वितीय पक्ष शेष मूल्यधन की राशि अन्दर मियाद प्रथम पक्ष को अदा करने में तत्पर रहने पर प्रथम पक्ष उक्त विकय की गई कृषि भूमि के विकय पत्र की रजिस्ट्री द्वितीय पक्ष के हित में करवाने के लिए बाध्य रहेगें। शर्त संख्या- 6 यह कि यदि अन्दर मियाद में द्वितीय पक्ष शेष मूल्यधन की राशि प्रथम पक्ष को अदा नहीं करे या सम्पत्ति/भूमि क्रय करने से इन्कार करे, तो प्रथम पक्ष को अग्रिम प्राप्त की हुई राशि अपने हर्जे खर्चे में जब्त कर सौदा बिचौती निरस्त करने का अधिकार होगा तथा प्रथम पक्ष उक्त भूमि को दीगर व्यक्ति को विकय आदि द्वारा हस्तान्तरित करने के लिए स्वतन्त्र रहेंगे। इसमें द्वितीय पक्ष को किसी प्रकार की आपत्ति करने का अधिकार नहीं होगा। इसी प्रकार यदि अन्दर मियाद में यदि द्वितीय पक्ष शेष मूल्यधन की राशि प्रथम पक्ष को अदा करने को तत्पर रहे और विक्रय पत्र तैयार कराकर प्रथम पक्ष को देने पर प्रथम पक्ष हस्ताक्षर न करे या विक्रय करने से इन्कार करे तो प्रथम पक्ष को जरिये न्यायालय विक्रय पत्र पंजीयन कराने व इसमें होने वाले समस्त हर्जे-खर्चे की राशि शेष मूल्यधन की राशि में से काटने का अधिकार होगा, इसमें प्रथम पक्ष को किसी प्रकार की आपत्ति आक्षेप करने का अधिकार नहीं होगा।"
24. प्रतिवादीगण द्वारा पूरक इकरारनामा दिनांक 13.09.2012 के माध्यम से वादी से 1,00,00,000/- रुपये प्राप्त कर लिए हैं। पूरक इकरारनामा के पृष्ठ संख्या 05 में उल्लेखित प्रथम चार पैरों को यहां उल्लेखित किया जाना उचित प्रतीत होता है :-
"पृष्ठ संख्या- 5 यह कि मूल्यधन की राशि में से 31,00,000/-रुपये अक्षरे इक्कतीस लाख रुपये प्रथम पक्ष ने द्वितीय पक्ष से दिनांक 14 अगस्त सन 2012 ईस्वी को किये गये इकरारनामा पर अपने हस्ताक्षर करते समय बतौर अग्रिम संयुक्त रूप से अपने-अपने हिस्सेनुपात अनुसार प्राप्त कर लिये हैं। जिनकी प्राप्ति होना प्रथम पक्ष इस लेखपत्र में स्वीकार करते हैं। यह कि शेष मूल्यधन की राशि में से 1,00,00,000/- रुपये अक्षरे एक करोड़ रुपये प्रथम पक्ष ने द्वितीय पक्ष से आज इस पूरक इकरारनामें पर अपने हस्ताक्षर करते समय अपने-अपने हिस्सेनुपात अनुसार द्वितीय पक्ष से प्राप्त कर लिये हैं। यह कि शेष शर्ते दिनांक 14 अगस्त सन् 2012 ईस्वी को किये गये इकरारनामें की यथावत रहेगी। यह कि उक्त पूरक इकरारनामा दिनांक 14 अगस्त सन् 2012 ईस्वी को किये गये इकरारनामें का अभिन्न अंग रहेगा।"
25. इस प्रकरण में प्रदर्श 01 इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 का अवलोकन करें तो यह स्पष्ट है कि वादी ने वादग्रस्त भूमि प्रतिवादीगण ने 43,00,000/-रुपये प्रति बीघा की दर से क्रय करने का इकरार किया है और प्रतिवादीगण ने वादग्रस्त भूमि को वादी को विक्रय करने का इकरार किया। उक्त विक्रय पेटे राशि 31,00,000/-रुपये प्रदर्श 01 इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 की पालना में प्रतिवादीगण ने प्राप्त कर लिए और पूरक इकरारनामा 13.09.2012 निष्पादित करके 1,00,00,000/-रुपये प्रतिवादीगण ने प्राप्त कर लिए। प्रदर्श 01 इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 की शर्त संख्या-02 के अनुरूप वादी को शेष मूलधन राशि में से 1,00,00,000/-रुपये दिनांक 15.09.2012 को प्रतिवादीगण को देने थे। इसकी पालना में पूरक इकरारनामा दिनांक 13.09.2012 के अनुरूप वादी ने प्रतिवादीगण को 1,00,00,000/- रुपये अदा कर दिए। यदि वादी का प्रदर्श 01 इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 में अंकित शर्तों की पालना करने का उद्देश्य नहीं होता तो इकरारानामा प्रदर्श 01 दिनांक 14.08.2012 की शर्त संख्या 02 की पालना में 1,00,00,000/- रुपये प्रतिवादीगण को शेष मूलधन की राशि पेटे इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 की शर्त संख्या 02 के अनुरूप नहीं करता। ऐसी स्थिति में वादी का यह आशय व सद्भावना थी कि वादग्रस्त भूमि को क्रय करके उस भूमि के प्रतिफलस्वरूप 43,00,000/-रुपये प्रति बीघा के आधार पर जो राशि अदा की जानी है, उस राशि को अदा करे। उस पेटे उसने 31,00,000/-रुपये इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 को निष्पादित करते समय अदा किये, तत्पश्चात् वादी ने प्रदर्श 01 इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 की शर्त संख्या-02 की पालना में, पूरक इकरारनामा दिनांक 13.09.2012 के अनुसार दिनांक 15.09.2012 तक देय शेष मूलधन राशि में से 1,00,00,000/- रुपये प्रतिवादीगण को अदा कर दिए। जहां तक शेष प्रतिफल राशि प्रदर्श 01 इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 की पालना में वादी अदा करने के लिए तैयार व तत्पर था या नहीं? इस तथ्य का प्रश्न है। वादी का यह कथन है कि प्रतिवादीगण ने उसे कहा कि भूमि कि सीमा का नापजोख करना है और उसके अनुरूप वादग्रस्त भूमि को विक्रय करना है। इसके अतिरिक्त वादी को यह भी ज्ञात हुआ कि प्रतिवादीगण ने वादग्रस्त भूमि के विभाजन के संबंध में राजस्व न्यायालय में वाद दायर कर रखा है और राजस्व न्यायालय ने इस संबंध में स्थगन आदेश दे रखा है, उसको दृष्टिगत रखते हुए प्रतिवादीगण ने शेष विक्रय प्रतिफल राशि प्राप्त करने में विलंब किया, जबकि वादी वादग्रस्त संपत्ति के विक्रय पेटे शेष प्रतिफल राशि प्रतिवादीगण को अदा करने के तैयार व तत्पर था। यद्यपि, प्रतिवादीगण ने वादी के इस तथ्य से इंकार किया है, लेकिन पत्रावली पर उपलब्ध दस्तावेज से यह स्पष्ट है कि वादी ने सहायक कलेक्टर, आमेर मुख्यालय जयपुर में वादग्रस्त संपत्ति के विभाजन के संबंध में उसका बेचान नहीं करने, आराजी के रिकॉर्ड व मौके की यथास्थिति बनाए रखने के लिए वाद संस्थित किया था, इसके संबंध में सहायक कलेक्टर एवं कार्यपालक मजिस्ट्रेट, आमेर मुख्यालय जयपुर ने प्रार्थना पत्र संख्या 112/2009 में पारित आदेश दिनांक 19.08.2009 के द्वारा मौके व रिकॉर्ड की यथास्थिति बनाए रखे जाने का आदेश दिया था, तत्पश्चात् दिनांक 09.06.2017 को मूल वाद के निस्तारण तक पूर्व में पारित अंतरिम अस्थायी निषेधाज्ञा आदेश दिनांक 19.08.2009 को स्थायी कर पत्रावली निर्णीत कर दी थी। ऐसी स्थिति में विद्वान सहायक कार्यपालक मजिस्ट्रेट, आमेर मुख्यालय जयपुर की आदेशिका दिनांक 19.08.2009 व 09.06.2017 से यह स्पष्ट है कि वादग्रस्त संपत्ति के संबंध में मौके व रिकॉर्ड की यथास्थिति को बनाए रखे जाने के आदेश मजिस्ट्रेट न्यायालय द्वारा दिया गया था। स्थगन आदेश अभी भी प्रभावी होना बताया गया है। ऐसी स्थिति में इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है कि प्रतिवादीगण ने राजस्व न्यायालय के आदेश दिनांक 19.08.2009 व दिनांक 09.06.2017 के आदेश की पालना में वादग्रस्त संपत्ति की रजिस्ट्री नहीं कराने की स्थिति में शेष प्रतिफल राशि वादी से प्राप्त कर वादग्रस्त भूमि की रजिस्ट्री कराने के लिए तैयार व तत्पर नहीं हो। यहां यह कहना न्यायोचित होगा कि इस संबंध में वादी की ओर से प्रतिवादीगण के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट संख्या 3/2013, पुलिस थाना हरमाड़ा, जयपुर में दर्ज कराई थी और पुलिस थाना हरमाड़ा ने अनुसंधान कर प्रत्यर्थीगण/अभियुक्तगण के विरुद्ध आरोप पत्र संख्या 239/2014 अंतर्गत धारा 420, 418, 406, 120बी भारतीय दण्ड संहिता में प्रस्तुत किया। पुलिस ने अनुसंधान में माना कि प्रतिवादीगण (आरोपीगण) द्वारा तकासमा का वाद सहायक कलेक्टर मुख्यालय आमेर जयपुर, जिसने स्थगन दिया गया और स्थगन के दौरान आरोपीगण के द्वारा षड्यंत्र के तहत भूमि का बेचान किया गया और उन्होंने वादी/परिवादी से रुपये प्राप्त कर लिये और इकरारनामा में दिये गये समय में रजिस्ट्री नहीं करवाई। प्रतिवादीगण तीन माह में रजिस्ट्री नहीं कराने के षड्यंत्र में शामिल थे। इस तथ्य को पुलिस थाना हरमाड़ा ने अपने आरोप पत्र में बताया है व आरोपी गोपीराम को इस प्रकरण में गिरफ्तार भी किया गया है, शेष प्रतिवादीगण द्वारा माननीय राजस्थान उच्च न्यायालय में धारा 482 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत याचिका संख्या 205/2013 प्रस्तुत की गई थी। प्रतिवादीगण द्वारा पुन: प्रार्थना पत्र संख्या 6056/2024 प्रार्थना पत्र अंतर्गत धारा 438 भारतीय दंड संहिता में प्रस्तुत की गई थी तथा इसमें आदेश दिनांक 15.07.2014 द्वारा इस न्यायालय की समकक्ष पीठ द्वारा प्रार्थी/वादी/परिवादी से प्राप्त किए गए 1,31,00,000/-रुपये को विचारण न्यायालय के समक्ष फिक्स्ड डिपोजिट में रखे जाने का और उक्त रुपयों को विधिपूर्ण प्राप्त करने वाले को दिए जाने का विचारण न्यायालय को आदेश दिया गया था। उक्त आदेश दिनांक 15.07.2014 की पालना में प्रतिवादीगण द्वारा 1,31,00,000/-रुपये जो वादी से प्राप्त किए गए, उसे विचारण न्यायालय के समक्ष जमा किया जाना बताया गया है। ऐसी स्थिति में यह स्पष्ट है कि प्रतिवादीगण ने वादग्रस्त भूमि के विक्रय पेटे 1,31,00,000/-रुपये प्राप्त करके शेष विक्रय प्रतिफल राशि इकरारनामा प्रदर्श-1 की पालना में तीन माह में प्राप्त नहीं करके वादी के पक्ष में रजिस्ट्री नहीं करवाकर धोखाधड़ी की, जिसके कारण वादी ने प्रतिवादीगण के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराई और उक्त प्रथम सूचना रिपोर्ट पुलिस थाना हरमाड़ा, जयपुर ने प्रतिवादीगण के विरुद्ध आरोप पत्र प्रस्तुत कर अनुसंधान के दौरान यह पाया कि प्रतिवादीगण ने जानबूझकर षड्यंत्र करके रुपये हड़पने के उद्देश्य से वादी से शेष विक्रय प्रतिफल राशि प्राप्त नहीं कर वादी के पक्ष में रजिस्ट्री नहीं करवाई। इस प्रकरण में प्रतिवादी संख्या 5 गोपी उर्फ गोपीराम के द्वारा जवाब दावा प्रस्तुत किया है, जिसमें उसने अपने हिस्से की भूमि को अन्य सहखातेदार के साथ मिलकर इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 की पालना में विक्रय पत्र में यह कहा है कि वादी के चाहे अनुसार उसने वादी की पत्नी सज्जन कंवर के हक में उसके हिस्से की भूमि का दिनांक 23.06.2014 को रजिस्ट्री करवा दी। प्रतिवादी संख्या 5 ने अपने लिखित पैरा संख्या 6 में इस तथ्य अंकित किया है कि वादी ने प्रतिवादीगण से शेष विक्रय प्रतिफल राशि लेकर विक्रय पत्र को रजिस्टर्ड कराने हेतु संपर्क किया था, लेकिन प्रतिवादीगण द्वारा विवादग्रस्त भूमि का सीमांकन व नापजोख करवाने की बात कहकर टालमटोल की गई, तत्पश्चात् वादी द्वारा प्रेषित कराए गए नोटिस का प्रतिवादीगण द्वारा गलत जवाब भिजवाया जाना अपने बयान में कहता है। ऐसी स्थिति में प्रतिवादी संख्या 5 की जवाब दावे की गई स्वीकारोक्ति से यह स्पष्ट है कि प्रतिवादीगण द्वारा भूमि के सीमांकन व नापजोख करवाने के लिए भूमि की रजिस्ट्री करवाने में टालमटोल की गई, जबकि वादी भूमि की रजिस्ट्री करवाने में तैयार व तत्पर था।
26. यहां यह कहना न्यायोचित होगा कि वादी पीडब्ल्यू 01 सुरेन्द्र द्वारा अपने बयान में यह कहा गया है कि उसके द्वारा शेष प्रतिफल राशि अदा करने के लिए दिनांक 08.11.2012 को प्रतिवादीगण को नोटिस दिया था, लेकिन उक्त नोटिस दिए जाने के संबंध में रजिस्ट्री की रसीद या उक्त नोटिस प्रतिवादीगण को प्राप्त हो गया हो या उन्होंने लेने से इंकार किया हो, इस संबंध में उसके द्वारा कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए हैं। ऐसी स्थिति में वादी के द्वारा दिनांक 08.11.2012 को प्रतिवादीगण को नोटिस दिए जाने का तथ्य तो स्पष्ट नहीं होता है, लेकिन पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्य से यह स्थिति स्पष्ट होती है कि प्रतिवादीगण ने दिनांक 06.12.2012 को अखबार में आम सूचना प्रकाशित करके इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 की पालना में तीन माह में शेष प्रतिफल राशि नहीं किए जाने के कारण इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 को निरस्त कर इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 की पालना करने से इंकार कर दिया। प्रदर्श-01 इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 की पालना नियत समयावधि में वादी ने अदा नहीं किए जाने के कारण से दिनांक 08.12.2012 को अखबार में प्रकाशन कराये जाने से पूर्व प्रतिवादीगण के द्वारा वादी को रजिस्टर्ड नोटिस दिया गया हो, उक्त नोटिस की प्राप्ति के पश्चात् भी वादी ने वादग्रस्त भूमि के विक्रय पेटे शेष प्रतिफल की राशि अदा नहीं की हो, इस तथ्य को प्रतिवादीगण द्वारा स्पष्ट नहीं किया गया है। अखबार में प्रकाशन से पूर्व प्रतिवादीगण द्वारा विक्रय इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 को निरस्त किए जाने का नोटिस दिया जाना आवश्यक था। उक्त नोटिस के पश्चात् भी यदि वादी द्वारा शेष क्रय प्रतिफल राशि अदा नहीं की जाती तो प्रतिवादीगण को अखबार में प्रकाशन के द्वारा दिनांक 14.08.2012 इकरारनामा को निरस्त किया जाता, तो प्रतिवादीगण का आशय व सद्भावना स्पष्ट होती कि उसने वादी को नोटिस दिया व नोटिस दिये जाने के बावजूद वादी ने प्रतिवादीगण को शेष विक्रय प्रतिफल की राशि अदा नहीं की। ऐसी स्थिति में यह स्पष्ट नहीं होता है कि वादी शेष प्रतिफल राशि अदा करने के लिए तैयार व तत्पर नहीं हो। इस संबंध में Kannan (Died) & Others vs Dhanalakshmi, Second Appeal No. 15/2009, order dated 17.10.2014, मद्रास उच्च न्यायालय के पैरा संख्या 14 को यहां उल्लेख किया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है :-
"14. As regards cancellation of the agreement, as rightly pointed out by the courts below, it is incumbent on the part of the defendant to intimate the alleged cancellation of the agreement to the plaintiff by sending a notice and non-issuance of any such notice would affect the defence of the defendant. It is also not disputed that majority of the sale price was paid by the plaintiff at the time of execution of the agreement itself coupled with the fact that possession of the property was also handed over. According to the plaintiff, the title deeds have also been handed over to her upon payment of Rs.900/- ten days after the agreement of sale. There was no exchange of notice between the parties atleast for about five years. Only when the plaintiff received the summons in the suit filed by the defendant in O.S. No. 319 of 1995, the plaintiff filed the present suit in O.S. No. 506 of 1995 in which it was stated that for the first time, she came to know about the conduct of the defendant in refusing to execute the sale deed after receiving the major amount towards the sale price. Only in the plaint in O.S. No. 319 of 1995, the defendant came out with a plea that the plaintiff did not perform her part of the contract and therefore he cancelled the agreement. Therefore, I am of the view that the question of limitation in the present case would commence only from the date of knowledge of refusal by the defendant and consequently, the suit filed by the plaintiff in O.S. No. 506 of 1995 is within the period of limitation. Both the courts below have rightly dealt with this aspect of the matter and held that the plaintiff had knowledge about the denial on the part of the defendant only on receipt of summons in O.S. No. 319 of 1995. Therefore, the only question of law arise in this second appeal is answered against the defendant/appellants."
27. उक्त विनिश्चिय में प्रतिपादित सिद्धांत को दृष्टिगत रखते हुए यह उल्लेखनीय है कि प्रतिवादीगण ने इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 की पालना में वादी द्वारा शेष प्रतिफल राशि अदा नहीं किये जाने पर नोटिस नहीं दिया और दिनांक 06.12.2012 को सीधे ही अखबार में प्रकाशित करवाकर इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 को निरस्त कर वादी द्वारा अदा की गई राशि को जब्त कर दिया। अगर प्रतिवादीगण का आशय सद्भावी होता तो वह नियत समयावधि में वादी द्वारा शेष प्रतिफल राशि अदा नहीं किये जाने की स्थिति में रजिस्टर्ड नोटिस देता, उसके पश्चात् अखबार में प्रकाशन करके या रजिस्टर्ड नोटिस या अन्य के माध्यम से इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 को निरस्त करता, लेकिन इस प्रकार का नोटिस दिए बिना ही प्रतिवादीगण ने सीधे ही दिनांक 06.12.2012 को अखबार में प्रकाशन करके इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 को निरस्त किया जाने का कृत्य प्रतिवादीगण का सद्भाविक प्रतीत नहीं होता है। यह संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है कि संपत्ति की कीमतें बढ़ जाने या वादग्रस्त संपत्ति की सीमा का नापजोख नहीं होने, जैसा कि प्रतिवादी संख्या 05 ने अपने जवाब दावे में कहा है तथा प्रतिवादीगण के द्वारा प्रतिवादीगण की नीयत में खोट आने और वादी के द्वारा प्रतिफलस्वरूप दी गई 1,31,00,000/- रुपये हड़प करने के उद्देश्य से और रजिस्ट्री नहीं कराने के उद्देश्य से प्रदर्श 1 इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 की पालना नहीं करने का आधार लेकर इकरारनामा निरस्त कर दिया। यह तथ्य पुलिस थाना हरमाड़ा, जिला जयपुर द्वारा पुलिस द्वारा किये अनुसंधान से प्रत्यर्थीगण/अभियुक्तगण के विरुद्ध आरोप पत्र प्रस्तुत करने और अनुसंधान में यह निष्कर्ष निकालने कि प्रतिवादीगण ने वादी को धोखा देने व रुपये एठने के उद्देश्य से रजिस्ट्री नहीं करवाई और शेष प्रतिफल राशि प्राप्त नहीं की और प्रतिवादीगण ने प्रदर्श-20 दिनांक 06.12.2012 को सीधे ही अखबार में प्रदर्श-1 इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 को निरस्त किये जाने का प्रकाशन करवाया, जिसके प्रत्युत्तर में वादी के द्वारा दिनांक 08.12.2012 को दैनिक समाचार पत्र दैनिक भास्कर में प्रतिवादीगण द्वारा प्रकाशित दिनांक 06.12.2012 की आम सूचना का खंडन किया। ऐसी स्थिति में यह स्पष्ट है कि वादी प्रदर्श 01 दिनांक 14.08.2012 की पालना करने व शेष प्रतिफल राशि वादी, प्रतिवादीगण को अदा करने के लिए तैयार व तत्पर था। यदि वादी शेष प्रतिफल राशि प्रतिवादीगण को अदा करने के लिए तैयार व तत्पर नहीं होता, तो प्रतिवादीगण द्वारा दिनांक 06.12.2012 को समाचार पत्र में प्रकाशित आम सूचना में इकरारनामा निरस्त करने का खण्डन दैनिक समाचार पत्र दिनांक 08.12.2012 में नहीं करता। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि प्रदर्श 19 दिनांक 06.12.2012, जो रजिस्टर्ड लिफाफा व उसकी रसीद के अनुसार दिनांक 07.12.2012 को वादी द्वारा प्रतिवादीगण को नोटिस भेजे गये थे, जिसमें उसने प्रदर्श-01 इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 की पालना में शेष प्रतिफल राशि अदा करने के लिए तैयार व तत्पर होने व प्रतिवादीगण द्वारा रजिस्ट्री करवाये जाने का नोटिस दिया गया था, जो नोटिस प्रदर्श 13 से प्रदर्श 18 इस प्रकरण में प्रदर्शित हुए हैं। इन नोटिसों को प्रतिवादीगण ने लेने से इंकार कर दिया। प्रदर्श 20 अखबार में प्रकाशन की आम सूचना प्रतिवादीगण ने दी, जो दिनांक 06.12.2012 को अखबार में प्रकाशित हुई। इसका तात्पर्य यह है कि उक्त प्रदर्श 20 अखबार की सूचना प्रतिवादीगण ने दिनांक 06.12.2012 से पूर्व दैनिक भास्कर समाचार पत्र में प्रकाशन हेतु दे दी थी, इस कारण 06.12.2012 को अखबार में इकरानामा निरस्त करने की सूचना आई।
28. यहां उल्लेखनीय है कि दिनांक 07.12.2012 वादी ने प्रतिवादीगण को रजिस्ट्री कराने के लिए प्रदर्श 13 से प्रदर्श 18 तक नोटिस भेजे जो प्रतिवादीगण ने प्राप्त नहीं किये और उक्त नोटिस इनकारी के साथ प्राप्त हो गये। यदि वादी का इकरानामा दिनांक 14.08.2012 की अनुपालना में शेष प्रतिफल राशि अदा करने का आशय सद्भावी नहीं होती तो प्रदर्श 13 से 18 के माध्यम से दिनांक 07.12.2012 को वह प्रतिवादीगण को नोटिस देकर रजिस्ट्री करवाने के लिए नहीं कहता तथा दिनांक 06.12.2012 को प्रकाशित इकरारनामा निरस्त की आम सूचना के खंडन का दिनांक 08.12.2012 को समाचार पत्र के माध्यम से नहीं करता। ऐसी स्थिति में प्रकरण में पक्षकारान के कृत्य, आचरण, प्रकरण की परिस्थितियों से यह स्पष्ट है कि प्रतिवादीगण ने वादी के द्वारा शेष प्रतिफल राशि अदा करने के लिए तैयार व तत्पर होने पर भी रजिस्ट्री नहीं करवाई तथा वादी को रजिस्टर्ड नोटिस द्वारा सूचना दिए बिना प्रदर्श 20 अखबार के माध्यम से दिनांक 06.12.2012 को सूचना प्रकाशित करवा दी व इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 को निरस्त करके वादी द्वारा अदा की गई राशि को जब्त कर दिया। प्रतिवादीगण के आचरण के कारण से वादी द्वारा प्रथम सूचना रिपोर्ट प्रतिवादीगण के विरुद्ध दर्ज करवाई गई, जिसमें प्रतिवादीगण के विरुद्ध पुलिस ने सक्षम न्यायालय के समक्ष आरोप पत्र प्रस्तुत किया और प्रतिवादीगण द्वारा षड्यंत्र कर वादी के पक्ष में रजिस्ट्री नहीं करवाया जाना बताया। ऐसी स्थिति में पक्षकारान के आचरण व उपरोक्त विवेचन के आधार पर यह स्पष्ट है कि वादी प्रदर्श-01 इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 की पालना में शेष प्रतिफल राशि अदा करने के लिए तैयार व तत्पर था, लेकिन प्रतिवादीगण ने शेष विक्रय प्रतिफल राशि प्राप्त कर रजिस्ट्री नहीं करवाई। ऐसी स्थिति में प्रदर्श 01 इकरारनामा दिनांक 14.08.2012 में तीन माह की अवधि में शेष प्रतिफल राशि अदा नहीं किए जाने के आधार पर समय संविदा का सार नहीं माना जा सकता है तथा प्रतिवादीगण उपरोक्त विवेचन में अभिनिर्धारित सिद्धांत के आधार पर यह बचाव नहीं ले सकता है कि वादी ने विक्रय पेटे शेष प्रतिफल राशि अदा नहीं की है तो वह इकरारनामा निरस्त करवाकर वादग्रस्त भूमि की रजिस्ट्री करवाने के लिए बाध्य नहीं है। ऐसी स्थिति में मेरे विनम्र मत में विद्वान विचारण न्यायालय ने विवाद्यक संख्या 1 से 4 वादी के विरुद्ध किए जाने में विधिक भूल व त्रुटि की है। अत: उपरोक्त विवेचनानुसार वादी की अपील आदेशानुसार स्वीकार किए जाने योग्य है।
29. वादी की ओर से प्रस्तुत प्रथम अपील अंतर्गत धारा 96 स्वीकार की जाकर विद्वान अपर जिला एवं सेशन न्यायाधीश, क्रम 02, जयपुर महानगर द्वितीय द्वारा सुरेन्द्र सिंह चारण बनाम नानछीलाल उर्फ नन्छू व अन्य, वाद संख्या 119/2020 (159/2014) में पारित निर्णय व डिक्री दिनांक 23.10.2021 अपास्त किया जाकर प्रतिवादी संख्या 02, 05 व 06 के अतिरिक्त शेष प्रतिवादीगण को आदेश दिया जाता है कि प्रदर्श 01 इकरारनामा 14.08.2012 में वर्णित विक्रय की गई संपत्ति के संबंध में शेष प्रतिफल राशि वादी से प्राप्त कर वादग्रस्त संपत्ति के संबंध में अपने हिस्से की रजिस्ट्री वादी के पक्ष में निष्पादित करें। विद्वान विचारण न्यायालय के समक्ष जमा की गई 1,31,00,000/- रुपये की राशि मय ब्याज प्रतिवादी संख्या 02, 05 व 06 के अतिरिक्त अन्य शेष प्रतिवादीगण प्राप्त करने के अधिकारी होंगे। वादग्रस्त भूमि के विक्रय पेटे शेष प्रतिफल राशि डेढ़ माह में वादी, प्रतिवादी संख्या 02, 05 व 06 के अतिरिक्त शेष प्रतिवादीगण को अदा करें। इस संबंध में प्रतिवादीगण अपने बैंक विवरण-खाता संख्या व खाते से संबंधित संपूर्ण विवरण की सूचना 15 दिवस में वादी व विद्वान विचारण न्यायालय को देगा। उक्त 15 दिवस के पश्चात् एक माह में वादी शेष विक्रय प्रतिफल की राशि प्रतिवादीगण द्वारा बताए गए बैंक खाते में आर.टी.जी.एस. या अन्य माध्यम के जरिये जमा करवाएगा। यदि प्रतिवादीगण बैंक खाते का संपूर्ण विवरण नियत समयावधि में उपरोक्त आदेशानुसार नहीं देता है तो डेढ़ माह में शेष प्रतिफल राशि का संदाय वादी विचारण न्यायालय के समक्ष जमा करवाएगा। तदुपरांत रजिस्ट्री नहीं करवाए जाने की स्थिति में वादी विद्वान विचारण न्यायालय के माध्यम से वादग्रस्त संपत्ति की रजिस्ट्री करवाने के लिए स्वतंत्र रहेगा तथा उक्त रजिस्ट्री का खर्चा वादी, प्रतिवादी संख्या 02, 05 व 06 के अतिरिक्त अन्य प्रतिवादीगण से प्राप्त करने का अधिकारी होगा, अन्यथा प्रदर्श-1 इकरारनामा के अनुसार संबंधित पक्षकार द्वारा रजिस्ट्री का खर्चा वहन किया जाएगा। अपील से संबंधित समस्त खर्चा वादी, प्रतिवादीगण संख्या 02, 05 व 06 के अतिरिक्त शेष प्रतिवादीगण से नियमानुसार प्राप्त करने का अधिकारी होगा। तद्नुसार डिक्री पर्चा मुर्तिब हो।
30. इस आदेश की प्रति के साथ विद्वान विचारण न्यायालय को प्रकरण की पत्रावली लौटाई जावे। संलग्न प्रार्थना-पत्र, यदि कोई लंबित हो, निस्तारित किए जाते हैं।
(CHANDRA PRAKASH SHRIMALI),J
Surendra Singh Charan v. Nanchi Lal alias Nanchu & Ors.
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