[2026:RJ-JP:43701]
HIGH COURT OF JUDICATURE FOR RAJASTHAN
BENCH AT JAIPUR
S.B. Civil First Appeal No. 502/2025
CNR: RJHC020148252025 | URN: CFA / 783U / 2025
(1) Sundarya (2) Chothya (3) Phoolchand (4) Prabhulal (5) Babulal (6) Hanuman — appellants 1, 2, 4 and 5 since deceased during the pendency of the suit, through their legal representatives; appellants 1, 2, 4, 5 and 6 through their power-of-attorney holder, appellant 3 ----Appellants
Versus
(1) Sanyukat Grah Nirman Sahkari Samiti Limited, Jaipur, through its Liquidator, Sub-Registrar, Sahkari Samitiya, Jaipur (2) Jaipur Development Authority, through its Commissioner (3) Deputy Commissioner Zone-8, Jaipur Development Authority (4) Sahkari Samitiya, State of Rajasthan, through Sub-Registrar ----Respondents
For Appellant(s): Mr. Anil Mehta, Sr. Adv. with Mr. Mukesh Kumar, Adv. and Mr. Ranvijay Singh, Adv.
For Respondent(s): Mr. Akshay Dutt Sharma, Adv. for Respondent Nos. 2 & 3; None present for Respondent Nos. 1 & 4
[NyayVidhan notes: Stored from the official Rajasthan High Court PDF of the judgment (hcraj file 200900005022025_10.pdf, 36 pages, uploaded 28.10.2026). (1) The judgment is written in Hindi, with quotations in English. The text was taken from the PDF's Unicode text layer by NyayVidhan and checked against the rendered pages; the dashes of the print appear as hyphens. Extraction marks were mended: a doubled 'फ' produced by the font (for example in 'प्रतिफल', 'फर्जी', 'फूलचंद' and 'फौजदारी'), words broken across text runs ('स्थिति', 'मौखिक'), the spacing of the justified English quotations (for example 'S.B.', 'i.e.', '42(b)', 'Hon'ble', 'person/vendee'), and 'रिकॉर्ड' (paragraph 31), set in the print as 'ा' with a candra sign. (2) The Court's own paragraph numbers 1-34 are kept. The date block before paragraph 1 is numbered 1-4 in the print; it is stored without those numbers. The numbered lists in paragraphs 9 (the appellants' authorities) and 12 (the points for determination) are shown as (1)-(4) and (1)-(3). Quoted matter (the issues in paragraph 4, Section 42 of the Rajasthan Tenancy Act in paragraph 14, the Supreme Court and Madhya Pradesh High Court extracts and the plaint extract in paragraph 24) is kept inside the quoting paragraph, and the headings 'विचारणीय बिंदु संख्या 1 व 2' and 'विचारणीय बिंदु संख्या 3' close paragraphs 13 and 23. The table of Articles 59 and 65 of the Limitation Act in paragraph 26 is transcribed row by row. (3) The cause title is abridged: the parties' parentage and addresses, and the names and addresses of the legal representatives of the deceased appellants, are omitted. (4) The text is otherwise as printed, including 'पूर्व्रत' (paragraph 4, issue 4), 'a Khatedar tenants', 'by a number of' and 'who in not a member' (paragraph 14), '42.General' (paragraph 15), the introduction 'न्यायोचित होगा:-16, 19 व 24' before the Suraj Lamp extract in paragraph 17, which reproduces paragraphs 16 and 19 of that judgment with paragraph 19 printed twice, 'in to that' (paragraph 18), 'प्रतिवादी कम 1' and 'एंजेटो.' (plaint extract, paragraph 24), 'recission' (paragraph 26 table) and 'उच्च्तम' (paragraph 31). (5) Page furniture (QR codes, page numbers, running heads, upload/download stamps, the staff line and the TCPDF line) is removed. The PDF is authoritative.]
[Source: Rajasthan High Court, hcraj.nic.in — judgment dated 28.10.2026.]
HON'BLE MR. JUSTICE CHANDRA PRAKASH SHRIMALI
Judgment
Arguments Concluded On: 22/09/2026
Judgment Reserved On: 22/09/2026
Full Judgment/Operative Part Pronounced: Full Judgment
Pronounced On: 28/10/2026
1. अपीलार्थीगण/वादीगण (जिन्हें आगे 'वादीगण' कहा जाएगा) की ओर से यह प्रथम अपील अन्तर्गत धारा 96 सिविल प्रक्रिया संहिता, विद्वान अपर जिला न्यायाधीश, क्रम-2, जयपुर महानगर प्रथम (जिसे आगे 'विचारण न्यायालय' कहा जाएगा) द्वारा दीवानी वाद संख्या 45/2014 सुंदरया व अन्य बनाम संयुक्त गृह निर्माण सहकारी समिति लिमिटेड, जयपुर व अन्य में पारित आलोच्य निर्णय व डिक्री दिनांक 09.12.2024 से व्यथित होकर प्रस्तुत की गयी है, जिसके द्वारा विद्वान विचारण न्यायालय ने वादीगण का वाद विरुद्ध प्रत्यर्थीगण/प्रतिवादीगण (जिन्हें आगे 'प्रतिवादीगण' कहा जाएगा) अस्वीकार कर खारिज किया है।
2. संक्षेप में, प्रकरण के तथ्य इस प्रकार हैं कि वादीगण का उनकी ओर से प्रस्तुत वाद में यह कथन रहा है कि वाद-पत्र के पैरा संख्या 2 में वर्णित खसरा नंबर की कृषि भूमि वादी संख्या 1 व 2 तथा उनके स्वर्गीय भाई रोड़िया उर्फ रोड़ू राम की स्वयं की स्वअर्जित संपत्ति होने के साथ उस पर उनके द्वारा काबिज होने, निवासरत होने व खातेदारी में होने के आधार पर राजस्व रिकॉर्ड में उनके नाम अंकित रही है। वादीगण ने पारिवारिक सहमति से परस्पर बंटवारानामा दिनांक 04.02.2003 को तत्कालीन तहसीलदार, तहसील सांगानेर, जयपुर के समक्ष व उनके द्वारा प्रमाणित करवाकर उक्त राजीनामे के आधार पर वादी संख्या 1, 2 व उनके स्वर्गीय भाई रोड़िया वादग्रस्त संपत्ति पर काबिज हो गये और तदनुरूप राजस्व रिकॉर्ड में इसका अंकन हो गया है। स्वर्गीय रोड़िया का स्वर्गवास होने के पश्चात उसके विधिक वारिसान उसके हिस्से की भूमि पर काबिज हो गये तथा वे भूमि पर काबिज होकर काश्त कर रहे हैं, जिसका नामांतरण दिनांक 30.01.2006 को बाद जांच, कब्जा व मौका वादीगण के नाम नामांतरण खोला जा चुका है। वादग्रस्त संपत्ति पर वादीगण के मकान 65 वर्ष पूर्व से निर्मित हैं। अन्य किसी व्यक्ति को उनकी जमीन को रहन, विक्रय व अंतरित करने का अधिकार नहीं है। प्रतिवादी संख्या 1 के तत्कालीन अध्यक्ष व पदाधिकारियों ने वाद-पत्र के पैरा संख्या 2 व 3 में वर्णित भूमि के संबंध में वादी संख्या 1, 2 व उनके स्वर्गीय भाई रोड़िया की अंगूठा निशानी दर्शाते हुए बिना वास्तविक प्रतिफल की अदायगी किये कूटरचित इकरारनामा व प्रतिज्ञा पत्र विक्रय इकरारनामा दिनांक 21.03.1991 तैयार किया व प्रतिवादी संख्या 2, जयपुर विकास प्राधिकरण में राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम की धारा 90-बी के तहत दिनांक 15.02.2008 को भूमि समर्पित कर दी, जबकि उस दिनांक से पूर्व दिनांक 13.12.2005 को रोड़िया उर्फ रोड़ू राम का स्वर्गवास हो चुका था। इन तथ्यों की जानकारी वादीगण को तब हुई, जब दिनांक 14.04.2014 को वे अपनी भूमि पर अम्बेडकर जयंती के उपलक्ष्य में कार्यक्रम आयोजित कर रहे थे। तब प्रतिवादी संख्या 1 के पदाधिकारियों ने वादीगण की कब्जाशुदा भूमि से उनका कब्जा हटाने का प्रयास किया और भूमि प्रतिवादी के पास होने के संबंध में इकरारनामा होना बताया तथा वादग्रस्त भूमि व आसपास की आवासीय भूमि के पट्टे जारी किया जाना बताया। जबकि वादी संख्या 1, 2 व उनके भाई रोड़िया ने कभी भी उक्त इकरारनामा व प्रतिज्ञा पत्र विक्रय इकरारनामा निष्पादित नहीं किया। वादीगण ने इकरारनामा व प्रतिज्ञा पत्र विक्रय इकरारनामा दिनांक 21.03.1991 अवैध, गैर-कानूनी होने और वादीगण के हितों के विपरीत होने तथा कोई प्रभाव नहीं रखने व बेअसर, शून्य (null and void) घोषित करवाने व वादग्रस्त भूमि के संबंध में पट्टा जारी नहीं करने एवं उसे हस्तांतरित नहीं करने, विक्रय नहीं करने अथवा विक्रय-पत्र, वसीयत या मुख्त्यारनामा आम निष्पादित नहीं किये जाने हेतु स्थाई निषेधाज्ञा व आदेशात्मक निषेधाज्ञा का अनुतोष चाहा है।
3. प्रतिवादी संख्या 1 द्वारा जवाब दावा प्रस्तुत नहीं होने पर न्यायालय द्वारा दिनांक 08.02.2017 को उसका जवाब दावा प्रस्तुत करने का अवसर बंद कर दिया गया। प्रतिवादी संख्या 2 व 3 ने जवाब दावा प्रस्तुत कर यह जाहिर किया कि वादग्रस्त भूमि राजस्व रिकॉर्ड में प्रतिवादी संख्या 2 के नाम दर्ज है और प्रतिवादी संख्या 1 की योजना 'विधानसभा नगर' प्रारंभ हो चुकी है। वादीगण का वादग्रस्त भूमि पर कब्जा, काश्त और मालिकाना हक नहीं है। भूखण्डधारियों के भूखण्ड पर बाउंड्री वॉल व मकान बने हुए हैं। अतः वादीगण की ओर से प्रस्तुत वाद खारिज किया जावे।
4. पक्षकारान के अभिवचनों के आधार पर विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा निम्न विवाद्यक विरचित किये गये:-
“1- आया वाद पत्र की चरण संख्या-2 में वर्णित भूमियां वादी संख्या -1 व 2 व उनके स्वर्गीय भाई रोडिया की स्वअर्जित सम्पत्तियां है व इनके हक कब्जे काश्त, रहवास व खातेदारी की भूमि है?
2-आया वादीगण विरूद्ध प्रतिवादीगण 1 लगायत 4 के विरूद्ध इस आशय की घोषणात्मक डिकी प्राप्त करने के अधिकारी है कि प्रतिवादी संख्या-1 द्वारा तैयार इकरारनामा अनुलग्नक ए व प्रतिज्ञा पत्र विक्रय इकरारनामा 21.03.1991 अनुलग्नक बी सहित दावे की मद संख्या 3 में वर्णित भूमि बाबत तैयार दस्तावेजात अवैध एवं गैरकानूनी है एवं वादीगण के हितों के विरूद्ध कोई प्रभाव नही रखते हो एवं वादीगण के हितों के विरूद्ध बेकलम व बेअसर दस्तावेज है?
3-आया वादीगण विरूद्ध प्रतिवादीगण इस आशय की भी स्थायी निषेद्याज्ञा प्राप्त करने के अधिकारी है कि वे वादीगण के मालिकाना हक की कब्जेशुदा भूमि बिना कानूनी अधिकार/प्रक्रिया के किसी भी प्रकार से किसी दीगर व्यक्तियों के नाम किसी प्रकार से हस्तान्तरित नही करे तथा वादग्रस्त भूमि को फर्जी दस्तावेज अनुलग्नक ए व अनुलग्नक - बी एवं अन्य दस्तावेजात के आधार पर किसी भी अन्य व्यक्ति को गैर कानूनी रूप से विक्रय करने अथवा उसके हक में विक्रय पत्र, वसीयत व मुख्तारआम, पटटा आदि जारी करने की कार्यवाही नहीं करे ना ही करावे?
4-आया वादीगण विरूद्ध प्रतिवादीगण इस आशय की भी आदेशात्मक आज्ञा प्राप्त करने के अधिकारी है कि प्रतिवादीगण वादीगण की वादग्रस्त भूमियों के सम्बन्ध में कोई अवैधानिक कृत्य नही करे किसी प्रकार के पटटे जारी करे तथा इकरारनामा अनुलग्नक ए व प्रतिज्ञापत्र, विक्रय इकरारनामा-बी के आधार पर यदि कोई रिकार्ड में तब्दीली की हो तो उसे पुनः दिनांक 04.02.2003 की पूर्व्रत स्थिति में बहाल कर देवें?
5-आया वादीगण को प्रतिवादीगण जयपुर विकास प्राधिकरण के विरूद्ध कोई वादकारण उत्पन्न नहीं होने के कारण दावा खारिज किए जाने योग्य है?
6-आया हस्तगत् वाद का श्रवण अधिकार इस न्यायालय को नहीं होकर राजस्व न्यायालय को है?
7-आया वादीगण का वाद पक्षकारों के कुसंयोजन के कारण खारिज किए जाने योग्य है?
8-आया वादी द्वारा वाद प्रस्तुति से पूर्व जयपुर विकास प्राधिकरण को नोटिस नहीं दिए जाने के कारण दावा चलने योग्य नहीं है?
9-अनुतोष?”
5. वादीगण की ओर से पी.डब्ल्यू.-1 फूलचंद, पी.डब्ल्यू.-2 हनुमान, पी.डब्ल्यू.-3 जगदीश, पी.डब्ल्यू.-4 श्रवण लाल, पी.डब्ल्यू.-5 सीताराम व पी.डब्ल्यू.-6 राकेश को परीक्षित करवाया गया है तथा दस्तावेजी साक्ष्य में प्रदर्श-1 से लगाकर प्रदर्श-47 दस्तावेज प्रदर्शित करवाये गये हैं। प्रतिवादीगण की ओर से कोई मौखिक व दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं की गयी है, ना ही कोई साक्षी परीक्षित करवाया गया है।
6. विद्वान विचारण न्यायालय ने उभय पक्षों को सुनकर विवाद्यक संख्या 1 से 4 वादीगण के विरुद्ध निर्णीत किये और विवाद्यक संख्या 5 से 8 वादीगण के पक्ष में व प्रतिवादीगण के विरुद्ध निर्णीत किये। प्रतिवादीगण की ओर से विवाद्यक संख्या 5 से 8 में विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा दिये गये मत के संबंध में कोई अपील व क्रॉस-ऑब्जेक्शन प्रस्तुत नहीं किये गये हैं। वादीगण द्वारा विवाद्यक संख्या 1 से 4 के संबंध में विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा पारित निर्णय को इस अपील के माध्यम से चुनौती दी गयी है।
7. वादीगण के विद्वान अभिभाषक का कथन है कि वाद-पत्र के पैरा संख्या 2 में वर्णित वादग्रस्त भूमि के संबंध में जो वादीगण की ओर से इकरारनामा प्रदर्श-1 व प्रतिज्ञा पत्र विक्रय इकरारनामा दिनांक 21.03.1991 प्रदर्श-2 प्रस्तुत हुआ है, जिसमें वादग्रस्त भूमि को वादी संख्या 1 व 2 एवं उनके भाई रोड़िया के द्वारा प्रतिवादी संख्या 1 को विक्रय किया जाना बताया गया है, वह इकरारनामा व प्रतिज्ञा-पत्र प्रारम्भ से ही शून्य, अवैध व गैर-कानूनी है और वादीगण के हितों के विरुद्ध कोई प्रभाव नहीं रखता है, क्योंकि अनुसूचित जातियां और अनुसूचित जनजातियां आदेश (संशोधन) अधिनियम, 1976 के तहत, जो भारत के राजपत्र में दिनांक 20.09.1976 को प्रकाशित होकर दिनांक 27.07.1977 से प्रभाव में आया एवं जो राजस्थान सरकार द्वारा दिनांक 06.03.1978 को प्रसारित किया गया, उक्त संशोधित सूची के क्रम संख्या 7 में राजस्थान में बलाई जाति को अनुसूचित जाति में रखा गया है। राजस्थान काश्तकारी अधिनियम की धारा 42-बी के अन्तर्गत अनुसूचित जाति के सदस्य अपनी भूमि को किसी भी विक्रय इकरार या विक्रय इकरारनामे के माध्यम से अन्य सवर्ण व्यक्ति या न्यायिक व्यक्ति (Juristic Person /Non-Human Entity) को विक्रय या अंतरित नहीं कर सकते हैं। इस प्रकरण में वादीगण की ओर से वादग्रस्त संपत्ति को प्रतिवादी संख्या 1, जो न्यायिक व्यक्ति है, अर्थात् संयुक्त गृह निर्माण सहकारी समिति लिमिटेड है, को विक्रय नहीं की जा सकती। ऐसी स्थिति में वादग्रस्त भूमि के संबंध में किया गया विक्रय इकरारनामा प्रारम्भ से ही शून्य, बेअसर व निष्प्रभावी होने के कारण वादीगण के हितों पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं डालता है और उक्त विक्रय इकरारनामा व प्रतिज्ञा पत्र विक्रय इकरारनामा दिनांक 21.03.1991, जो वादीगण के द्वारा निष्पादित नहीं किया गया है, वह शून्य व प्रभावहीन होने के कारण उक्त इकरारनामे के तहत प्रतिवादी संख्या 1 द्वारा राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम की धारा 90-बी के तहत वादग्रस्त भूमि को यदि प्रतिवादी संख्या 2 के यहाँ समर्पित कर उसके संबंध में यदि कोई अग्रिम कार्यवाही भी की गयी है, तो वह गैर-कानूनी व निष्प्रभावी है तथा वादीगण के हितों पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं डालती है। इस तथ्य पर विद्वान विचारण न्यायालय ने किसी प्रकार से विचार नहीं किया है। राजस्व रिकॉर्ड में वादग्रस्त भूमि वादीगण के नाम दर्ज है। वादीगण की ओर से जयपुर विकास प्राधिकरण (प्रतिवादी संख्या 2) द्वारा पारित आदेश दिनांक 15.02.2008, जिसके द्वारा वादग्रस्त भूमि का नामांतरण प्रतिवादी संख्या 1 के नाम अंकित किये जाने हेतु आदेश दिया गया था, उसे न्यायालय संभागीय आयुक्त, जयपुर के समक्ष अपील संख्या 84/2014 के माध्यम से चुनौती दी गयी तथा विद्वान संभागीय आयुक्त, जयपुर ने अपने निर्णय दिनांक 16.06.2014 में वादीगण के अनुसूचित जाति के सदस्य होने व उनके द्वारा किये गये इकरारनामे को धारा 90-बी की कार्यवाही हेतु शून्य घोषित करने के कारण प्रतिवादी संख्या 2 द्वारा दिनांक 15.02.2008 को पारित आदेश (प्रदर्श-47) को निरस्त कर दिया तथा तहसीलदार, सांगानेर को राजस्व रिकॉर्ड में आदेश दिनांक 15.02.2008 से पूर्व की स्थिति बहाल किये जाने का आदेश दिया गया। ऐसी स्थिति में विद्वान संभागीय आयुक्त के निर्णय दिनांक 16.06.2014 के अनुसार पुनः वादग्रस्त भूमि का स्वामित्व वादीगण पर स्थापित हो गया। विद्वान संभागीय आयुक्त के निर्णय दिनांक 16.06.2014 को प्रतिवादी संख्या 1 के द्वारा विद्वान न्यायालय राजस्व मण्डल, अजमेर में निगरानी याचिका संख्या 4425/2014 के माध्यम से चुनौती दी गयी, जिसमें विद्वान राजस्व मण्डल, अजमेर ने अपने निर्णय दिनांक 22.09.2014 (प्रदर्श-37) के द्वारा प्रतिवादी संख्या 1 की निगरानी याचिका को अस्वीकार कर विद्वान संभागीय आयुक्त के आदेश दिनांक 16.06.2014 को पुष्ट किया। ऐसी स्थिति में यह स्पष्ट है कि वर्तमान में भी वादग्रस्त भूमि प्रतिवादीगण संख्या 1 व 2 के स्वामित्व की नहीं है। प्रदर्श-1 इकरारनामा व प्रदर्श-2 प्रतिज्ञा पत्र विक्रय इकरारनामा दिनांक 21.03.1991 पर गवाहों के हस्ताक्षर नहीं हैं। जिस इकरारनामे पर तथाकथित वादीगण के अंगूठा निशानी होना बता दिया व संबंधित इंद्राज खाली छोड़ दिया। उक्त इकरारनामा व प्रतिज्ञा पत्र विक्रय इकरारनामा प्रदर्श-1 व प्रदर्श-2 अपंजीकृत (unregistered) हैं। संपत्ति अंतरण अधिनियम के अन्तर्गत अपंजीकृत व अपर्याप्त स्टाम्प पर लिखित दस्तावेज कोई विधिक महत्व नहीं रखता है व उसके द्वारा भूमि का अंतरण नहीं किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में भी प्रदर्श-1 व 2 दस्तावेज प्रारम्भ से ही शून्य और प्रभावहीन हैं।
8. इसके अतिरिक्त उक्त इकरारनामे के प्रतिफल के रूप में कोई भी राशि वादीगण की ओर से प्राप्त नहीं की गयी है। शून्य दस्तावेज को पश्चातवर्ती प्रक्रम में विधिक दृष्टि से लागू नहीं किया जा सकता है। संभागीय आयुक्त और राजस्व न्यायालय के निर्णय अंतिम हो चुके हैं। उनके विरुद्ध माननीय उच्च न्यायालय या अन्य किसी सक्षम प्राधिकारी का उक्त आदेशों पर कोई स्थगन आदेश भी नहीं है। विद्वान विचारण न्यायालय ने इन सब तथ्यों पर विचार किये बिना प्रारम्भ से ही शून्य संव्यवहार/दस्तावेज इकरनामा व प्रतिज्ञा पत्र विक्रय इकरारनामा दिनांक 21.03.1991 अपंजीकृत व अपर्याप्त स्टाम्प पर होने पर भी इस तथ्य पर विचार नहीं किया, ना ही राजस्थान काश्तकारी अधिनियम की धारा 42-बी के प्रावधानों पर विचार किया और बिना किसी न्यायसंगत व उचित आधार के वादीगण का दावा अस्वीकार कर खारिज कर दिया। दिनांक 13.04.2014 को प्रतिवादी संख्या 1 के कार्मिकों द्वारा वादीगण को डराने, धमकाने व वादग्रस्त भूमि पर अपने अधिकारों को छोड़ने और फर्जी इकरारनामे के आधार पर भूमि पर कब्जा करने की धमकी देने से वाद-कारण उत्पन्न हुआ। तत्पश्चात दिनांक 14.04.2014 को प्रतिवादी संख्या 1 के एजेंट वगैरह ने वादग्रस्त भूमि पर अवैध रूप से कब्जा करके अन्य व्यक्तियों को सुपुर्द करने व भूखण्ड काटने की धमकी दी, जिससे भी वाद-कारण उत्पन्न हुआ। वादग्रस्त संपत्ति पर वादीगण का कब्जा है, उनका पानी का कनेक्शन है तथा वे उस पर काश्त करते हैं। तथाकथित इकरारनामे तथा उसके माध्यम से राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम की धारा 90-बी के अन्तर्गत प्रतिवादी संख्या 2 के यहाँ कार्यवाही किये जाने की वादीगण को जानकारी/ध्यान नहीं था। परिसीमा अधिनियम के अनुच्छेद 65 में वर्णित प्रावधानों के तहत जब मूल दस्तावेज, जिसके आधार पर वाद लाया गया है, प्रारम्भ से ही शून्य, प्रभावहीन व विधि-विरुद्ध हो, तो ऐसे प्रकरण में 12 वर्ष की परिसीमा लागू होती है, जिसके अनुसार समुचित अवधि में वादीगण की ओर से वाद प्रस्तुत किया गया था। परंतु इस पर विद्वान विचारण न्यायालय ने अपने आलोच्य निर्णय दिनांक 09.12.2024 में कोई विचार नहीं किया और वादीगण का वाद परिसीमा अवधि से बाहर होना मानते हुए खारिज कर दिया। वादीगण की ओर से प्रस्तुत मौखिक व दस्तावेजी साक्ष्य के खण्डन में प्रतिवादीगण की ओर से कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं की गयी है। ऐसी स्थिति में वादीगण की ओर से प्रस्तुत साक्ष्य अखण्डनीय होने के कारण विद्वान विचारण न्यायालय ने वादीगण का वाद अस्वीकार कर खारिज किये जाने में विधिक भूल व त्रुटि की है। अतः वादीगण की ओर से प्रस्तुत यह प्रथम अपील स्वीकार की जाकर विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा पारित आलोच्य निर्णय व डिक्री दिनांक 09.12.2024 अपास्त किया जावे।
9. वादीगण के विद्वान अभिभाषक ने अपने तर्कों के समर्थन में निम्न विनिश्चय प्रस्तुत किये:-
(1) State of Rajasthan & Ors. v. Aanjaney Organic Herbal Pvt. Ltd.; (2012) 10 SCC 283
(2) Rajasthan Housing Board v. New Pink City Nirman Sahkari Samiti Ltd. & Anr.; 2015 (7) SCC 601
(3) R. Nagaraj (Dead) Through LRs & Anr v. Rajmani & Ors.; 2025 LiveLaw (SC) 416
(4) Banwari Lal v. Anand & Ors.; S.B. Civil Revision Petition No. 138/2009; Order Dated 03.05.2012
10. प्रतिवादी संख्या 2 व 3 के विद्वान अभिभाषक का कथन है कि वादी संख्या 1 व 2 तथा उनके भाई रोड़िया की ओर से इकरारनामा प्रदर्श-1 व प्रतिज्ञा पत्र विक्रय इकरारनामा दिनांक 21.03.1991 प्रदर्श-2 निष्पादित किया गया था, जिसके तहत वादीगण द्वारा प्रतिफल राशि प्राप्त कर ली गयी थी और उनके द्वारा वादग्रस्त भूमि का कब्जा प्रतिवादी संख्या 1 को दे दिया गया था। इसके आधार पर राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम की धारा 90-बी के तहत प्रतिवादी संख्या 1 ने प्रतिवादी संख्या 2 के समक्ष भूमि समर्पित की, जिसके आधार पर प्रतिवादी संख्या 2 ने दिनांक 15.02.2008 को आदेश पारित किया और वादग्रस्त भूमि प्रतिवादी संख्या 2 के नाम दर्ज हो गयी। उसके अनुरूप प्रतिवादी संख्या 2 के साथ किये गये अनुबंध व शर्तों के अनुसार प्रतिवादी संख्या 1 ने वादग्रस्त भूमि/भूखण्ड पर 'विधानसभा नगर' योजना के तहत कॉलोनी बनाकर, भूखण्ड काटकर उनका कब्जा सुपुर्द कर दिया। वादग्रस्त भूमि के संबंध में विक्रय इकरारनामा व प्रतिज्ञा पत्र विक्रय इकरारनामा निष्पादित किये जाने की जानकारी वादीगण को रही है, लेकिन उसके पश्चात भी उन्होंने इतने वर्षों तक कोई विरोध नहीं किया। वादीगण की ओर से परीक्षित साक्षी पी.डब्ल्यू.-6 राकेश कुमार ने अपने बयानों की प्रतिपरीक्षा में प्रतिवादी संख्या 2 के यहाँ धारा 90-बी की कार्यवाही के संबंध में वर्ष 2008 में ही जानकारी होना स्वीकार किया है। वर्ष 2008 से 3 वर्ष अर्थात् वर्ष 2011 तक परिसीमा की अवधि में परिसीमा अधिनियम के अनुच्छेद 58 के तहत वाद संस्थित नहीं किया गया है, जबकि वादीगण की ओर से यह वाद दिनांक 18.04.2014 को परिसीमा अवधि व्यतीत होने के पश्चात प्रस्तुत किया गया है। ऐसी स्थिति में विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा वाद को परिसीमा अवधि से बाहर मानकर विधि-अनुकूल निर्णय व डिक्री पारित की गयी है। विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा पारित निर्णय व डिक्री दिनांक 09.12.2024 में हस्तक्षेप किये जाने का कोई विधिक आधार नहीं है। अतः वादीगण/अपीलार्थीगण की ओर से प्रस्तुत यह अपील अस्वीकार कर खारिज की जावे।
11. मैंने उभयपक्षों के तर्कों पर मनन किया तथा पत्रावली का अवलोकन किया।
12. इस प्रकरण में न्यायालय के समक्ष निम्न विचारणीय प्रश्न उद्भूत होते हैंः-
(1) क्या इकरारनामा प्रदर्श-1 व प्रतिज्ञा पत्र विक्रय इकरारनामा दिनांक 21.03.1991 प्रदर्श-2 प्रारम्भ से ही अवैध, शून्य, गैर-कानूनी तथा वादीगण के हितों के विपरीत है?
(2) क्या यदि उक्त इकरारनामा व प्रतिज्ञा पत्र विक्रय इकरारनामा दिनांक 21.03.1991 प्रारम्भ से ही शून्य, बेअसर व गैर-कानूनी है, तो वादीगण वादपत्र में अंकित घोषणा, स्थायी एवं आदेशात्मक निषेधाज्ञा प्राप्त करने के अधिकारी हैं?
(3) क्या वाद परिसीमा अवधि से बाहर है?
13. उक्त विचारणीय बिन्दुओं के संबंध में विवेचन निम्न प्रकार हैः-
विचारणीय बिंदु संख्या 1 व 2
14. भारत सरकार की अधिसूचना व राजपत्र में प्रकाशन के पश्चात एवं राजस्थान सरकार द्वारा स्वीकृत किये जाने से यह स्थिति स्पष्ट होती है कि राजस्थान सरकार ने अनुसूचित जाति की जो सूची प्रकाशित की है, उसमें क्रम संख्या 7 पर 'बलाई' जाति को रखा गया है। वादीगण बलाई जाति के होने के कारण अनुसूचित जाति के सदस्य हैं, यह स्वीकृत स्थिति है। राजस्थान काश्तकारी अधिनियम की धारा 42-बी अनुसूचित जाति के खातेदारों की भूमि को अनुसूचित जाति के खातेदारों के अतिरिक्त अन्य किसी जाति के व्यक्ति या न्यायिक व्यक्ति को अंतरित करने पर प्रतिबंध लगाती है। राजस्थान काश्तकारी अधिनियम की धारा 42 को यहाँ उल्लेखित किया जाना न्यायोचित होगा:-
“42. General restrictions on sale, gift and bequest— The sale, gift or bequest by a Khatedar tenants of his interest in the whole or part of his holding shall be void, if —
(a) Omitted.
(b) such sale, gift or bequest is by a number of Scheduled Caste in favour of a person who is not a member of the Scheduled Caste, or by a member of a Scheduled Tribe in favour of a person who in not a member of the Scheduled Tribe.
[(bb) such sale, gift or bequest, notwithstanding anything contained in clause (b), is by a member of Saharia Scheduled Tribe in favour of a person who is not a member of the said Saharia tribe.]
(c) Omitted."
15. उपरोक्त बिंदु को माननीय उच्चतम न्यायालय ने State of Rajasthan & Ors. v. Aanjaney Organic Herbal Pvt. Ltd. (2012) 10 SCC 283 में उल्लेखित किया है, जिसमें राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 की धारा 42-बी को विवेचित किया गया है। उक्त निर्णय के पैरा संख्या 7, 13 व 15 को यहाँ उल्लेखित किया जाना न्यायोचित होगा:-
"7. Heard the learned counsel on either side. The Act is a beneficial legislation which takes special care to protect the interest of the members of Scheduled Castes and Scheduled Tribes. Section 42 provides some general restrictions on sale, gift and bequest of the interest of Scheduled Castes and Scheduled Tribes, in the whole or part of their holding. The reason for such general restrictions is not only to safeguard the interest of the members of Scheduled Castes and Scheduled Tribes, but also to see that they are not exploited by the members of non-Scheduled Castes and Scheduled Tribes. The relevant provisions of Section 42(b) are extracted below for easy reference:
“42.General restrictions on sale, gift & bequest.— The sale, gift or bequest by a khatedar tenant of his interest in the whole or part of his holding shall be void, if —
(a)*
(b) such sale, gift or bequest is by a member of a Scheduled Caste in favour of a person who is not a member of the Scheduled Caste, or by a member of a Scheduled Tribe in favour of a person who is not a member of the Scheduled Tribe;”
"13. We are, therefore, of the view that the reasoning of the High Court that the respondent being a juristic person, the sale effected by a member of Scheduled Caste to a juristic person, which does not have a caste, is not hit by Section 42 of the Act, is untenable and gives a wrong interpretation to the abovementioned provision."
"15. The abovementioned condition makes it amply clear that the mutation on the basis of registration shall be made only in the name of that particular person/vendee who is a member of Scheduled Caste/Scheduled Tribe and not in the name of any firm/society/company/legal institution wherein a person is office-bearer or member. When we apply the above principles to the transfer of land in question, we have no hesitation to hold that the sale deed effected on 26-9-2005 was void and therefore rightly denied mutation in the revenue records. Properties, therefore purchased by the respondent from the members of Scheduled Castes vide sale deed dated 26-9-2005 and other sale deeds, therefore, are void since hit by Section 42(b) of the Act and it is so declared. The State can, therefore, repossess the lands and return the lands to the original owners who are members of Scheduled Castes."
16. उक्त विनिश्चय में अभिनिर्धारित सिद्धांत के अनुसार अनुसूचित जाति के सदस्य की भूमि राजस्थान काश्तकारी अधिनियम की धारा 42-बी के अन्तर्गत विक्रय, दान या अंतरित नहीं की जा सकती है और ऐसा अंतरण प्रारम्भ से ही शून्य है। उक्त विनिश्चय के आधार पर प्रतिवादी संख्या 1, जो कि एक न्यायिक व्यक्ति है, उसको भी अनुसूचित जाति की भूमि का अंतरण नहीं किया जा सकता है। यह तथ्य इस प्रकरण में अभिनिर्धारित किया गया है। ऐसी स्थिति में उपरोक्त प्रावधान व विनिश्चय के अनुरूप यदि इकरारनामा व प्रतिज्ञा पत्र विक्रय इकरारनामा दिनांक 21.03.1991 निष्पादित भी हुआ है, तो वादीगण के हितों के विरुद्ध वह प्रारम्भ से ही प्रभावहीन, शून्य व अवैध होने के कारण बेअसर है।
17. इस प्रकरण में प्रतिवादीगण की ओर से कोई मौखिक या दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं की गयी है। वादीगण की ओर से परीक्षित साक्षीगण द्वारा वादीगण की ओर से प्रस्तुत इकरारनामा व प्रतिज्ञा पत्र विक्रय इकरारनामा दिनांक 21.03.1991 को निष्पादित नहीं होना व उस इकरारनामे के प्रतिफल स्वरूप कोई प्रतिफल राशि प्राप्त नहीं होना बताया गया है। प्रदर्श-1 इकरारनामे का अवलोकन करें तो इकरारनामा, जो कि टंकित है, उसमें वादी संख्या 1, 2 व उनके स्वर्गीय भाई रोड़िया की अंगूठा निशानी होना बताया गया है। इस इकरारनामे में वादग्रस्त संपत्ति कितने रुपये प्रति बीघा के हिसाब से विक्रय की गयी, वह जगह खाली छोड़ी हुई है। ऐसी स्थिति में प्रथम दृष्टया यह माना जा सकता है कि इकरारनामा टाइप करवाकर उक्त इकरारनामे पर अंगूठा निशानी करवा ली गयी हो। अंगूठा निशानी वादी संख्या 1, 2 व रोड़िया की है या नहीं, इस तथ्य को यद्यपि वादीगण द्वारा परीक्षित साक्षीगण ने स्वीकार नहीं किया है और इस संबंध में विधि विज्ञान प्रयोगशाला की भी कोई रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं हुई है। लेकिन प्रदर्श-1 इकरारनामे को दृष्टिगत करें तो यह स्पष्ट है कि वादग्रस्त भूमि कितने रुपये प्रति बीघा में विक्रय की गयी, इसका अंकन किये बिना वादी संख्या 1, 2 व स्वर्गीय रोड़िया की तथाकथित अंगूठा निशानी करवा दी गयी। उक्त इकरारनामा प्रदर्श-1 न तो नोटरी से तस्दीकशुदा है, न ही रजिस्ट्रीकरण अधिनियम में वर्णित प्रावधानों के तहत पंजीकृत है तथा पर्याप्त स्टाम्प पर भी नहीं है। प्रदर्श-2 प्रतिज्ञा पत्र विक्रय इकरारनामा दिनांक 21.03.1991 हस्तलिखित प्रस्तुत हुआ है, जिसमें वादग्रस्त भूमि 2,70,000/- रुपये प्रति बीघा में विक्रय किया जाना बताया गया है। यह प्रतिज्ञा पत्र विक्रय इकरारनामा प्रदर्श-2 टाइपशुदा भी प्रस्तुत हुआ है। हस्तलिखित व टाइपशुदा प्रतिज्ञा पत्र विक्रय इकरारनामा अलग-अलग क्यों निष्पादित किया गया व इसकी क्या आवश्यकता थी, इसे प्रतिवादीगण की ओर से स्पष्ट नहीं किया गया है। हस्तलिखित प्रतिज्ञा पत्र विक्रय इकरारनामा में वादग्रस्त भूमि 2,70,000/- रुपये प्रति बीघा की दर से विक्रय किया जाना अंकित किया गया है, जबकि प्रदर्श-2 प्रतिज्ञा पत्र विक्रय इकरारनामा दिनांक 21.03.1991 टाइपशुदा में वादग्रस्त भूमि 2,50,000/- रुपये प्रति बीघा में विक्रय किये जाने का अनुबंध दर्शित हो रहा है। प्रदर्श-2 प्रतिज्ञा पत्र विक्रय इकरारनामा हस्तलिखित व प्रदर्श-2 प्रतिज्ञा पत्र विक्रय इकरारनामा टंकित दोनों में वादग्रस्त भूमि के विक्रय किये जाने की राशि में अंतर स्पष्ट रूप से नजर आ रहा है। उक्त तथ्य भी यह संदेह उत्पन्न करता है कि प्रदर्श-1 व प्रदर्श-2 दस्तावेज दोनों पक्षों के मध्य निष्पादित हुए भी या नहीं। इस प्रकरण में वादी संख्या 1 व 2 स्वयं परीक्षित नहीं हुए हैं, क्योंकि उनका दौराने दावा स्वर्गवास हो चुका है। मुख्त्यार पी.डब्ल्यू.-1 फूलचंद बलाई परीक्षित हुआ है, जिसने प्रदर्श-2 पर अंगूठा निशानी वादी संख्या 1, 2 व रोड़िया की हो, तो उसे पता नहीं होना बताया है। यदि यह माना भी जावे कि प्रदर्श-1 व 2 दस्तावेज वादीगण ने निष्पादित कर वादग्रस्त भूमि के संबंध में इकरारनामा व प्रतिज्ञा-पत्र निष्पादित किये हैं, तो भी यह स्पष्ट होता है कि वादीगण अनुसूचित जाति के सदस्य होने के कारण राजस्थान काश्तकारी अधिनियम की धारा 42-बी के तहत उनकी भूमि को गैर-अनुसूचित जाति के व्यक्ति या न्यायिक व्यक्ति को अंतरित नहीं किया जा सकता। इस कारण उक्त दस्तावेज प्रारम्भ से ही शून्य, निष्प्रभावी व अवैध हैं। इसके अतिरिक्त, उक्त दस्तावेज न तो पंजीकृत हैं और न पर्याप्त स्टाम्प पर हैं। अचल संपत्ति का विक्रय पंजीकृत दस्तावेज से ही होना चाहिए और इस संबंध में Suraj Lamp & Industries (P) Ltd. (2) v. State of Haryana; (2012) 1 SCC 656 में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गये निम्न मत को यहाँ उल्लेखित किया जाना न्यायोचित होगा:-16, 19 व 24
"16. Section 54 of the TP Act makes it clear that a contract of sale, that is, an agreement of sale does not, of itself, create any interest in or charge on such property. This Court in Narandas Karsondas v. S.A. Kamtam [(1977) 3 SCC 247] observed: (SCC pp. 254-55, paras 32-33 & 37)
“32. A contract of sale does not of itself create any interest in, or charge on, the property. This is expressly declared in Section 54 of the Transfer of Property Act. (See Ram Baran Prasad v. Ram Mohit Hazra [AIR 1967 SC 744 : (1967) 1 SCR 293].) The fiduciary character of the personal obligation created by a contract for sale is recognised in Section 3 of the Specific Relief Act, 1963, and in Section 91 of the Trusts Act. The personal obligation created by a contract of sale is described in Section 40 of the Transfer of Property Act as an obligation arising out of contract and annexed to the ownership of property, but not amounting to an interest or easement therein. 33. In India, the word ‘transfer’ is defined with reference to the word ‘convey’. … The word ‘conveys’ in Section 5 of the Transfer of Property Act is used in the wider sense of conveying ownership. * 37. … that only on execution of conveyance, ownership passes from one party to another….”
"19. Any contract of sale (agreement to sell) which is not a registered deed of conveyance (deed of sale) would fall short of the requirements of Sections 54 and 55 of the TP Act and will not confer any title nor transfer any interest in an immovable property (except to the limited right granted under Section 53-A of the TP Act). According to the TP Act, an agreement of sale, whether with possession or without possession, is not a conveyance. Section 54 of the TP Act enacts that sale of immovable property can be made only by a registered instrument and an agreement of sale does not create any interest or charge on its subject-matter."
"19. Any contract of sale (agreement to sell) which is not a registered deed of conveyance (deed of sale) would fall short of the requirements of Sections 54 and 55 of the TP Act and will not confer any title nor transfer any interest in an immovable property (except to the limited right granted under Section 53-A of the TP Act). According to the TP Act, an agreement of sale, whether with possession or without possession, is not a conveyance. Section 54 of the TP Act enacts that sale of immovable property can be made only by a registered instrument and an agreement of sale does not create any interest or charge on its subject-matter."
18. उक्त विनिश्चय में अभिनिर्धारित सिद्धांत के अनुसार यदि विक्रय अनुबंध पंजीकृत नहीं है, तो संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 54 व 55 में वर्णित प्रावधानों के तहत विक्रय पूर्ण होना नहीं माना जायेगा। विक्रय अनुबंध के आधार पर भूमि के स्वामित्व के विधिक अधिकार भी उत्पन्न नहीं होते हैं। इसी प्रकार का अभिमत माननीय मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा अपने विनिश्चय Smt. Santosh Singh vs Shri Manoharlal Sheetalani; Misc. Petition No. 7195/2025; Order Dated 09.01.2026 में भी व्यक्त किया है, जिसका सुसंगत भाग निम्नानुसार है:-
"7. The issue that whether unstamped document can be admitted in evidence was considered by the Hon'ble Apex Court in the case of Vijay vs. Union of India and others (2023) 17 SCC 455, in which the Hon'ble Supreme Court while considering the effect of Section 35 of Stamp Act has held that the document not being properly stamped cannot be admitted in evidence for any purpose and to impose the bar of admissibility provided under Section 35, twin conditions are required to be fulfilled, i.e. 1 that the instrument must be chargeable with duty in to that it is not duly stamped. In the present case, the instrument is duly chargeable with duty and that is not disputed by the petitioners and it not being sufficiently stamped is also not disputed. Therefore, in the present case, the judgement in the case of Vijay (supra) would be squarely applicable in which the Hon'ble Apex Court has held as under:-
"19. The sub-issue that the Court is confronting is whether an agreement to sell, handing over possession prior to the amendment brought in the year 1989 or 1990, is a conveyance so as to be covered under Article 23 as existing on the date of execution of the agreement(s). On this aspect we may only observe that the causal amendment was brought in only in 1990 i.e. prior to the transaction in question. And a three-Judge Bench of this Court in Suraj Lamp & Industries (P) Ltd. (2) v. State of Haryana; (2012) 1 SCC 656 in considering the scope of an agreement to sell observed thus: (SCC pp. 665-66, paras 18-19)
"18. It is thus clear that a transfer of immovable property by way of sale can only be by a deed of conveyance (sale deed). In the absence of a deed of conveyance (duly stamped and registered as required by law), no right, title or interest in an immovable property can be transferred."
19. उक्त विनिश्चय में अभिनिर्धारित सिद्धांत के आधार पर प्रदर्श-1 इकरारनामा व प्रदर्श-2 प्रतिज्ञा पत्र विक्रय इकरारनामा, जिसके द्वारा वादीगण द्वारा प्रतिवादी संख्या 1 को वादग्रस्त भूमि का विक्रय किये जाने का इकरार होना बताया गया है, वह अपंजीकृत होने, पर्याप्त स्टाम्प पर नहीं होने व अनुसूचित जाति के सदस्यों द्वारा गैर-अनुसूचित जाति/न्यायिक व्यक्ति को विक्रय नहीं किये जा सकने के आधार पर प्रारम्भ से ही शून्य व बेअसर है। उक्त विवेचन के आधार पर प्रदर्श-1 इकरारनामा व प्रदर्श-2 प्रतिज्ञा पत्र विक्रय इकरारनामा दिनांक 21.03.1991 प्रारम्भ से ही शून्य, अवैध व वादीगण के हितों के प्रतिकूल होने के आधार पर बेअसर है।
20. इसके अतिरिक्त, वर्तमान प्रकरण में प्रदर्श-6 राजस्व विभाग की पासबुक प्रस्तुत हुई है, जिसमें वादग्रस्त भूमि वादी संख्या 1, 2 व उनके भाई रोड़िया की बतायी गयी है। तहसीलदार, तहसील सांगानेर के समक्ष वादीगण की ओर से प्रस्तुत प्रार्थना-पत्र व वादग्रस्त भूमि के विभाजन को दिनांक 04.02.2003 को प्रस्तुत होना बताया गया है, जिसके अनुसार वादी संख्या 1, 2 व उनके भाई रोड़िया के मध्य वादग्रस्त भूमि का विभाजन तहसीलदार, सांगानेर की उपस्थिति में व उनके हस्ताक्षर से हुआ तथा हल्का पटवारी का भी उस पर अंकन है और पारिवारिक बंटवारानामा प्रदर्श-8 प्रकरण में प्रस्तुत हुआ है, जिसके अनुरूप वादग्रस्त भूमि का नामांतरण वादीगण के हक में खोलने के तथ्य भी पत्रावली पर आये हैं।
21. यह उल्लेखनीय है कि प्रदर्श-1 व 2 इकरारनामा व प्रतिज्ञा पत्र विक्रय इकरारनामा के आधार पर प्रतिवादी संख्या 1 ने प्रतिवादी संख्या 2 के समक्ष राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम की धारा 90-बी के तहत भूमि समर्पित करने हेतु प्रार्थना-पत्र प्रस्तुत किया था, जिस पर प्रतिवादी संख्या 2 ने प्रदर्श-47 आदेश दिनांक 15.02.2008 के द्वारा वादग्रस्त भूमि का नामांतरण प्रतिवादी संख्या 2 (जयपुर विकास प्राधिकरण) के पक्ष में खोलने हेतु आदेशित किया था। उक्त प्रतिवादी संख्या 2 के आदेश दिनांक 15.02.2008 (प्रदर्श-47) को संभागीय आयुक्त के समक्ष अपील के माध्यम से वादीगण द्वारा चुनौती दी गयी थी। संभागीय आयुक्त, जयपुर ने अपने निर्णय दिनांक 16.06.2014 के द्वारा वादग्रस्त भूमि के संबंध में राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम की धारा 90-बी के तहत की गयी कार्यवाही को शून्य मानकर प्रतिवादी संख्या 2 द्वारा पारित आदेश दिनांक 15.02.2008 (प्रदर्श-47) को निरस्त कर दिया, जिसके अनुसार पुनः भूमि वादीगण के नाम दर्ज हो गयी और प्रतिवादी संख्या 2 के नाम राजस्व रिकॉर्ड में भूमि दर्ज नहीं रही। संभागीय आयुक्त, जयपुर के आदेश दिनांक 16.06.2014 को प्रतिवादी संख्या 1 ने राजस्व मण्डल, अजमेर में निगरानी याचिका के माध्यम से चुनौती दी थी, जिसे विद्वान राजस्व मण्डल, अजमेर ने निर्णय दिनांक 22.09.2014 (प्रदर्श-37) के माध्यम से अस्वीकार कर खारिज कर दिया। ऐसी स्थिति में यह स्पष्ट है कि संभागीय आयुक्त के निर्णय दिनांक 16.06.2014 (प्रदर्श-29) के अनुरूप वादग्रस्त भूमि प्रतिवादी संख्या 2 के स्वामित्व की नहीं रही और वादग्रस्त भूमि वादीगण के स्वामित्व की होने के आधार पर प्रदर्श-1 व 2 के तहत प्रतिवादीगण का वादग्रस्त भूमि के संबंध में स्वामित्व स्थापित नहीं होने के कारण कोई विधिक अधिकार उत्पन्न नहीं होते हैं।
22. यहां यह भी उल्लेखनीय है कि वादीगण की ओर से प्रतिवादी संख्या 1 के विरुद्ध एक प्रथम सूचना रिपोर्ट संख्या 548/2014 पुलिस थाना जेडीए में दर्ज करवाई गयी थी, जिसमें पुलिस ने अनुसंधान कर, बाद अनुसंधान प्रतिवादी संख्या 1 के पदाधिकारी रविदत्त शर्मा, जिसके द्वारा प्रदर्श-1 व 2 दस्तावेज निष्पादित होना बताया गया था, और काश्तकारों को वादग्रस्त भूमि की विक्रय प्रतिफल राशि नहीं दिया जाना और भूमि की कीमत का भुगतान किये बिना भूमि पर 'विधानसभा नगर' योजना विकसित कर आवंटन-पत्र जारी किया जाना तथा काश्तकारों के साथ धोखाधड़ी करने पर प्रतिवादी संख्या 1 के पदाधिकारी रविदत्त शर्मा, राकेश शर्मा व विशंभर दयाल के विरुद्ध आरोप-पत्र संख्या 11/2016 अन्तर्गत धारा 406, 420, 120-बी भारतीय दंड संहिता में सक्षम न्यायालय में प्रस्तुत किया गया है।
23. ऐसी स्थिति में यह स्पष्ट है कि पुलिस थाना, जेडीए द्वारा भी प्रदर्श-1 इकरारनामा व प्रदर्श-2 प्रतिज्ञा पत्र विक्रय इकरारनामा के तहत प्रतिवादी संख्या 1 के पदाधिकारियों द्वारा वादी संख्या 1, 2 व रोड़िया को वादग्रस्त भूमि की प्रतिफल राशि नहीं दिया जाना व उनके साथ धोखाधड़ी किया जाना पाया गया है। इस तथ्य पर भी विद्वान विचारण न्यायालय ने विचार नहीं किया है। उपरोक्त तथ्यों के आधार पर भी वादग्रस्त भूमि वादीगण के स्वामित्व व आधिपत्य की होना स्पष्ट होता है। वादीगण की ओर से परीक्षित साक्षीगण पी.डब्ल्यू.-1 लगायत पी.डब्ल्यू.-5 ने वादग्रस्त भूमि पर वादीगण का कब्जा होना बताया है, जिसके खण्डन में प्रतिवादीगण की ओर से कोई मौखिक व दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं की गयी है। वादग्रस्त भूमि पर वादीगण का कब्जा नहीं होकर प्रतिवादी संख्या 1, 2 व अन्य भूखण्डधारियों का कब्जा हो, इस संबंध में कोई मौखिक व दस्तावेजी साक्ष्य प्रतिवादीगण की ओर से प्रस्तुत नहीं की गयी है। ऐसी स्थिति में वादीगण द्वारा प्रस्तुत मौखिक व दस्तावेजी साक्ष्य अखण्डनीय होने के कारण उस पर अविश्वास किये जाने का कोई न्यायसंगत व उचित आधार नहीं है। इन समस्त तथ्यों व परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए विद्वान विचारण न्यायालय ने अपने आलोच्य निर्णय व डिक्री दिनांक 09.12.2024 में उक्त साक्ष्य को समुचित रूप से विवेचित किये बिना सरसरी तौर पर वादीगण का वाद अस्वीकार कर खारिज किया है। ऐसी स्थिति में उक्त बिंदुओं के संबंध में विद्वान विचारण न्यायालय ने वादीगण का दावा अस्वीकार कर खारिज किये जाने में विधिक भूल व त्रुटि की है और इस आधार पर वादीगण आदेशानुसार स्थाई व आदेशात्मक निषेधाज्ञा भी प्राप्त करने के अधिकारी हैं।
विचारणीय बिंदु संख्या 3
24. जहाँ तक यह वाद परिसीमा अधिनियम के अन्तर्गत परिसीमा अवधि में प्रस्तुत किया गया है या नहीं, इस प्रश्न का संबंध है, तो वादीगण द्वारा यह वाद दिनांक 18.04.2014 को प्रस्तुत किया गया है। उक्त वाद-पत्र के पैरा संख्या 24 में वाद-कारण के संबंध में वादी द्वारा निम्न तथ्य अंकित किये गये हैं:-
"यह कि वाद कारण वादीगण को विरूद्ध प्रतिवादींगण दिनांक 13.04.2014 (तेरह अप्रेल दो हजार चौदह) को प्रतिवादी नम्बर 1 (एक) समिति के कर्मियो द्वारा वादीगण को डराने धमकाने एवं वादीगण को फौजदारी कार्यवाही ना करने, राजीनामा करने, अपना अधिकार छोडने एवं प्रतिवादी कम 1 (एक) का कहा नहीं मानने पर पुनः फर्जी कार्यवाही करने एवं फर्जी विक्रय इकरारनामे के आधार पर गैरकानूनी कब्जा लेने एवं दीगर व्यक्तियो को सुपुर्द कर देने एवं दीगर व्यक्तियो को लोभ लालच दे मिलीभगत कर लेने की धमकी देने से उत्पन्न हुआ, तत्पश्चात् दिनाक 14.04.14 को प्रतिवादी कम 1 के एंजेटो. पूर्व प्रतिनिधियो द्वारा अवैध कैम्प लगा कर वादीगण को ऐलानिया धमकी देने से, गैरकानूनी कब्जा लेने एवं दीगर व्यक्तियो को सुपुर्द कर देने एवं दीगर व्यक्तियो को लोभ लालच दे मिलीभगत कर लेने की धमकी देने से उत्पन्न होकर लगातार जारी है, प्रतिवादीगण क्रम 2 लगायत 4 के द्वारा प्रतिवादी क्रम 1 के ऐजेन्टो के प्रभाव में आकर गैरकानूनी कृत्यो से गुरेज ना करने एवं समस्त वस्तुस्थित वादीगण द्वारा दिनाक 13.04.14 को एवं पश्चात् अवगत कराने के बावजूद पट्टे आदि जारी किये जाने के आशय का खुलासा किये जाने से उनके विरूद्ध वाद-कारण उत्पन्न होकर लगातार जारी है।"
25. उक्त वाद-पत्र में अंकित तथ्यों के आधार पर वादीगण को प्रतिवादी संख्या 1 के कार्मिकों द्वारा डराने-धमकाने, कब्जा छोड़ने व इकरारनामे के आधार पर अन्य व्यक्तियों को भूमि सुपुर्द करने एवं अवैध कैम्प लगाने की धमकी दिये जाने के कारण दिनांक 13.04.2014 को वाद-कारण उत्पन्न हुआ और वादीगण की ओर से दिनांक 18.04.2014 को यह वाद प्रस्तुत किया गया। वादीगण की ओर से पी.डब्ल्यू.-1 फूलचंद, पी.डब्ल्यू.-2 हनुमान, पी.डब्ल्यू.-3 जगदीश, पी.डब्ल्यू.-4 श्रवण लाल व पी.डब्ल्यू.-5 सीताराम को परीक्षित करवाया गया है। उन साक्षीगण के शपथ-पत्रों का अवलोकन करें तो उन्होंने दिनांक 13.04.2014 को वाद-कारण उत्पन्न होना बताया है।
26. परिसीमा अधिनियम, 1963 के अनुच्छेद 59 व 65 को यहाँ उल्लेखित किया जाना न्यायोचित होगा:-
[Table, as printed:]
| 59. | To cancel or set aside an instrument or decree or for the recission of a contract | Three years | When the facts entitling the plaintiff to have the instrument or decree cancelled or set aside or the contract rescinded first become known to him. |
| 65. | For possession of immovable property or any interest therein based on title | Twelve years | When the possession of the defendant becomes adverse to the plaintiff. |
27. वर्तमान प्रकरण के तथ्यों व परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित विनिश्चय Prem Singh v. Birbal, (2006) 5 SCC 353 के सुसंगत भाग को यहाँ उद्धरित किया जाना न्यायोचित होगा:-
“16. When a document is valid, no question arises of its cancellation. When a document is void ab initio, a decree for setting aside the same would not be necessary as the same is non est in the eye of the law, as it would be a nullity. XXX 18. Article 59 would be attracted when coercion, undue influence, misappropriation or fraud which the plaintiff asserts is required to be proved. Article 59 would apply to the case of such instruments. It would, therefore, apply where a document is prima facie valid. It would not apply only to instruments which are presumptively invalid. (See Unni v. Kunchi Amma [ILR (1891) 14 Mad 26] and Sheo Shankar Gir v. Ram Shewak Chowdhri [ILR (1897) 24 Cal 77].) XXX 20. If the plaintiff is in possession of a property, he may file a suit for declaration that the deed is not binding upon him but if he is not in possession thereof, even under a void transaction, the right by way of adverse possession may be claimed. Thus, it is not correct to contend that the provisions of the Limitation Act would have no application at all in the event the transaction is held to be void. XXX 25. In Balvant N. Viswamitra v. Yadav Sadashiv Mule [(2004) 8 SCC 706] this Court opined that a void decree can be challenged even in execution or a collateral proceeding holding: (SCC p. 712, para 9)
“9. The main question which arises for our consideration is whether the decree passed by the trial court can be said to be ‘null’ and ‘void’. In our opinion, the law on the point is well settled. The distinction between a decree which is void and a decree which is wrong, incorrect, irregular or not in accordance with law cannot be overlooked or ignored. Where a court lacks inherent jurisdiction in passing a decree or making an order, a decree or order passed by such court would be without jurisdiction, non est and void ab initio. A defect of jurisdiction of the court goes to the root of the matter and strikes at the very authority of the court to pass a decree or make an order. Such defect has always been treated as basic and fundamental and a decree or order passed by a court or an authority having no jurisdiction is a nullity. Validity of such decree or order can be challenged at any stage, even in execution or collateral proceedings.””
उक्त विनिश्चय में अभिनिर्धारित सिद्धांत के आधार पर माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अपने पश्चातवर्ती विनिश्चय Shanti Devi v. Jagan Devi, 2025 SCC OnLine SC 1961 में यह मत व्यक्त किया गया है कि:-
"29. This Court in Prem Singh v. Birbal, reported in (2006) 5 SCC 353, discussed the position of law as to when Article 59 of the Limitation Act, 1963 would apply and opined as follows:
i. First, that Article 59 of the Limitation Act, 1963 would only encompass within its fold fraudulent transactions which are ‘voidable’ transactions and not those that are ‘void’. In other words, Article 59 would apply only where an instrument is prima facie valid and not to those instruments which are presumptively invalid.
ii. Secondly, that when the document in question is void ab initio/or void, a decree for setting aside the same would not be necessary since such a transaction would be non-est in the eyes of law, owing to it being a nullity.
iii. Thirdly, a fine distinction was drawn between fraudulent misrepresentation as regards the ‘character of the document’ and fraudulent misrepresentation as regards the ‘contents of a document’. It is only in the former situation that the instrument would be void and, in the latter, it would remain voidable. To put it simply, Article 59 would not govern the period of limitation in respect of a void transaction.
iv. Lastly, that if a deed was executed by the plaintiff when he was a minor and it was thereby void, he had two options to file a suit to get the property conveyed thereunder i.e., he could either file the suit within 12 years of the deed or within 3 years of attaining majority.
The relevant observations are reproduced as under:
“13. Article 59 of the Limitation Act applies specially when a relief is claimed on the ground of fraud or mistake. It only encompasses within its fold fraudulent transactions which are voidable transactions. -xxx- 16. When a document is valid, no question arises of its cancellation. When a document is void ab initio, a decree for setting aside the same would not be necessary as the same is non est in the eye of the law, as it would be a nullity. 17. Once, however, a suit is filed by a plaintiff for cancellation of a transaction, it would be governed by Article 59. Even if Article 59 is not attracted, the residuary article would be. 18. Article 59 would be attracted when coercion, undue influence, misappropriation or fraud which the plaintiff asserts is required to be proved. Article 59 would apply to the case of such instruments. It would, therefore, apply where a document is prima facie valid. It would not apply only to instruments which are presumptively invalid. (See Unni v. Kunchi Amma [ILR (1891) 14 Mad 26] and Sheo Shankar Gir v. Ram Shewak Chowdhri [ILR (1897) 24 Cal 77].) ....................... XXX 31. As per the dictum in Prem Singh (supra), this Court, in order to ascertain whether Article 65 of the Limitation Act, 1963 would apply to the present factual scenario, has to first determine whether the fraud was alleged as regards the contents of the sale deed dated 14.06.1973 or the character of such sale deed. Both the First Appellate Court as well as the High Court have arrived at the finding that the plaintiff had never executed the said sale deed in the first place as it was proved that it was not her thumb impression that was affixed therein. Therefore, this finding goes to the character of the sale deed and thereby, renders it void/void ab initio. Hence, as per this decision, there remained no reason for the plaintiff to seek for its cancellation. The original sale deed also was not produced before the Trial Court by the defendants in order to rebut the doubt cast upon the veracity of the said sale deed. Consequently, Article 59 of the Limitation Act, 1963 would find no application to the case in hand. XXX 38. ................ In such circumstances as well, i. e., in the absence of the sale consideration being tendered, the sale deed would be void and the plaintiff would not be required to seek its cancellation. Therefore, Article 59 of the Limitation Act, 1963 could not be said to be applicable to the present facts."
28. वादीगण द्वारा परीक्षित साक्षी पी.डब्ल्यू.-6 राकेश कुमार अपने बयानों की प्रतिपरीक्षा में एक जगह तो यह कहता है कि "विवादित भूमि के संबंध में 90B की कार्यवाही JDA में हुयी हो तो पता नहीं है।" वहीं दूसरी तरफ यह साक्षी अपने बयानों की प्रतिपरीक्षा में यह भी कहता है कि "90B की कार्यवाही JDA में हो गयी, यह हमें 2008 में पता चला था।" वर्ष 2008 में धारा 90-बी की कार्यवाही जेडीए में होने की बात वर्ष 2008 में ही पता चली हो, इस तथ्य की पुष्टि गवाह पी.डब्ल्यू.-6 के अतिरिक्त वादीगण की ओर से परीक्षित किसी भी अन्य साक्षी ने नहीं की है। पी.डब्ल्यू.-6 राकेश का 32 वर्षीय होना शपथ-पत्र में बताया गया है और दिनांक 02.11.2019 को वह न्यायालय के समक्ष परीक्षित हुआ है तथा प्रतिपरीक्षा में उसकी आयु 33 वर्ष होना बताया गया है। ऐसी स्थिति में वर्ष 2008 में जब उसे धारा 90-बी की कार्यवाही जेडीए में होने का पता चला, तब वह मात्र 22 वर्ष का था। उसे धारा 90-बी की कार्यवाही होने की जानकारी किससे मिली, इस तथ्य को उसने स्पष्ट नहीं किया है। प्रतिवादी संख्या 2, जेडीए द्वारा इस संबंध में कोई नोटिस दिया गया हो, यह भी स्पष्ट नहीं हुआ है। किसी व्यक्ति ने वर्ष 2008 में पी.डब्ल्यू.-6 राकेश को यह तथ्य बताया हो, यह भी पत्रावली से स्पष्ट नहीं है। राकेश, स्वर्गीय प्रभुलाल बलाई का पुत्र है तथा प्रभुलाल, वादी संख्या 1 व 2 के भाई स्वर्गीय रोड़िया का पुत्र है। रोड़िया व प्रभुलाल इस प्रकरण में परीक्षित नहीं हुए हैं, ना ही ऐसा कोई दस्तावेज प्रकरण में प्रदर्शित हुआ है जिससे यह माना जा सके कि वर्ष 2008 में राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम की धारा 90-बी के अन्तर्गत कार्यवाही किये जाने की जानकारी पी.डब्ल्यू.-6 राकेश को हो गयी हो। इस संबंध में प्रतिवादीगण की ओर से कोई मौखिक व दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत करके यह साबित नहीं किया गया है कि पी.डब्ल्यू.-6 राकेश को वादग्रस्त भूमि के संबंध में धारा 90-बी के तहत कार्यवाही किये जाने की पुख्ता जानकारी वर्ष 2008 में ही हो गयी थी। ऐसी स्थिति में प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट नहीं है कि पी.डब्ल्यू.-6 राकेश को वादग्रस्त भूमि के विवाद के संबंध में वर्ष 2008 में पूर्ण ज्ञान हो गया था और वर्ष 2008 से निर्धारित अवधि में वाद-पत्र प्रस्तुत नहीं किया गया हो।
29. यदि यह माना भी जावे कि वर्ष 2008 में पी.डब्ल्यू.-6 राकेश को धारा 90-बी की कार्यवाही के संबंध में ज्ञान हो गया था, तो भी निम्न विनिश्चयों में अभिनिर्धारित सिद्धांतों के आधार पर परिसीमा अवधि से परे वाद प्रस्तुत करना नहीं माना जा सकता है। जैसा कि पूर्व में उल्लेखित किया जा चुका है कि प्रदर्श-1 इकरारनामा व प्रदर्श-2 प्रतिज्ञा पत्र विक्रय इकरारनामा दिनांक 21.03.1991 प्रारम्भ से ही शून्य, प्रभावहीन, बेअसर और वादीगण के हितों के प्रतिकूल हैं। तथा यह भी प्रथम दृष्टया स्पष्ट है कि संभागीय आयुक्त, जयपुर व राजस्व मण्डल, अजमेर के निर्णयों एवं प्रस्तुत दस्तावेजात के अनुसार वादग्रस्त भूमि पर वादीगण वर्तमान में भी विधिक स्वामित्व रखते हैं तथा उनका वादग्रस्त भूमि पर कब्जा है एवं वे उस भूमि पर निवासरत होकर काश्त करते चले आ रहे हैं। यद्यपि वादीगण द्वारा परीक्षित साक्षीगण अपने बयानों में यह नहीं बता पाये हैं कि वादग्रस्त भूमि पर क्या काश्त हो रही है, तथापि इस तथ्य को भी प्रतिवादीगण की ओर से कोई मौखिक व दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत कर साबित नहीं किया गया है कि वादग्रस्त भूमि पर प्रतिवादी संख्या 1 या अन्य भूखण्डधारियों का कब्जा हो। यदि वादग्रस्त भूमि पर अन्य भूखण्डधारी काबिज होते, तो उन्हें प्रकरण में पक्षकार बनाया जाता, लेकिन ऐसा कोई भी भूखण्डधारी इस प्रकरण में पक्षकार नहीं है।
30. यदि पी.डब्ल्यू.-6 राकेश कुमार के प्रतिपरीक्षा में कहे गये कथनों को सही भी मानें और वर्ष 2008 में इस तथ्य का ज्ञान होने से वाद-कारण उत्पन्न होना भी स्वीकार करें, तो भी विधिक विनिश्चयों में अभिनिर्धारित सिद्धांतों को दृष्टिगत रखते हुए वाद-कारण उत्पन्न होने से 12 वर्ष की अवधि में वादीगण की ओर से वाद संस्थित किये जाने के कारण यह वाद मियाद (परिसीमा) अवधि के भीतर संस्थित किया गया माना जावेगा। वादीगण ने प्रदर्श-1 व प्रदर्श-2 दस्तावेजों के निष्पादन को सिरे से नकारा है। इस प्रकार उक्त दस्तावेजों का निष्पादन नहीं किये जाने, प्रदर्श-2 प्रतिज्ञा-पत्र हस्तलिखित व टंकित दोनों रूपों में होने व उनमें विक्रय राशि के संबंध में स्पष्ट अंतर होने, प्रतिफल राशि अदा किये जाने की कोई रसीद पत्रावली पर नहीं होने तथा प्रतिवादी संख्या 1 के पदाधिकारियों के विरुद्ध पुलिस थाना, जेडीए द्वारा धोखाधड़ी किये जाने के संबंध में आरोप-पत्र प्रस्तुत होने के अकाट्य तथ्य पत्रावली पर स्थापित हैं। वादग्रस्त भूमि अन्य भूखण्डधारियों को आवंटित हो गयी हो या उनके द्वारा बाउंड्री वॉल का निर्माण किये जाने की जानकारी वादीगण को रही हो, इस संबंध में किसी प्रकार की कोई साक्ष्य पत्रावली पर नहीं आयी है।
31. इस प्रकरण में प्रदर्श-1 इकरारनामा व प्रदर्श-2 प्रतिज्ञा पत्र विक्रय इकरारनामा 21.03.1991 अपंजीकृत व अपर्याप्त स्टाम्प पर होने तथा राजस्थान काश्तकारी अधिनियम की धारा 42 बी के प्रावधानों के विरुद्ध होने के कारण से प्रारम्भ से ही शून्य, निष्प्रभावी व वादीगण के हितों के विरुद्ध बेअसर माने गये हैं। उपरोक्त विवेचन के आधार पर वादीगण के नाम राजस्व रिकॉर्ड में वादग्रस्त भूमि का अंकन है एवं वादग्रस्त भूमि पर वादीगण का कब्जा होना बताया गया है। प्रदर्श-1 इकरारनामा व प्रदर्श-2 प्रतिज्ञा पत्र विक्रय इकरारनामा के निष्पादन व प्रतिफल राशि की अदायगी के संबंध में उपरोक्त विवेचन के आधार पर संदेहास्पद तथ्य सामने आये हैं। ऐसी स्थिति में माननीय उच्च्तम न्यायालय के उपरोक्त विनिश्चयों में अभिनिर्धारित सिद्धांत को दृष्टिगत रखते हुए यदि गवाह पी.डब्ल्यू. 6 राकेश के बयानों पर विश्वास भी करें, तो भी अनुच्छेद 65 परिसीमा अधिनियम में वर्णित प्रावधानों के तहत वादकारण से 12 वर्ष की अवधि में यह वाद प्रस्तुत किया गया है। ऐसी स्थिति में वाद परिसीमा अवधि से बाहर नहीं माना जा सकता है। ऐसी स्थिति में प्रदर्श-1 इकरारनामा व प्रदर्श-2 प्रतिज्ञा पत्र विक्रय इकरारनामा वर्ष 1991 में निष्पादित होना दर्शित होने, वर्ष 2008 में उक्त भूमि के संबंध में धारा 90-बी की कार्यवाही की कथित जानकारी होने के आधार पर वर्ष 2014 में संस्थित किये गये वाद को मियाद अवधि से बाहर मानकर विद्वान विचारण न्यायालय ने मेरे विनम्र मत में गंभीर विधिक भूल व त्रुटि की है। अतः मेरे विनम्र मत में उक्त विचारणीय बिंदुओं के विवेचन के अनुसार विवाद्यक संख्या 1 से 4 को विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा वादीगण के विरुद्ध निर्णीत करने में स्पष्ट विधिक भूल व त्रुटि कारित की गयी है। अतः अपीलार्थीगण/वादीगण की ओर से प्रस्तुत यह प्रथम अपील स्वीकार किये जाने योग्य है।
32. परिणामतः अपीलार्थीगण की ओर से प्रस्तुत यह सिविल प्रथम अपील अन्तर्गत धारा 96 सिविल प्रक्रिया संहिता स्वीकार की जाकर विद्वान अपर जिला न्यायाधीश संख्या 2, जयपुर महानगर प्रथम द्वारा दीवानी वाद संख्या 45/2014 सुंदरया व अन्य बनाम संयुक्त गृह निर्माण सहकारी समिति लिमिटेड, जयपुर व अन्य में पारित आलोच्य निर्णय व डिक्री दिनांक 09.12.2024 अपास्त की जाती है तथा वाद-पत्र के पैरा संख्या 2 व 3 में वर्णित भूमि, जिसके संबंध में इकरारनामा प्रदर्श-1 व प्रतिज्ञा पत्र विक्रय इकरारनामा दिनांक 21.03.1991 प्रदर्श-2 प्रारम्भ से ही शून्य, अवैध, गैर-कानूनी व बेअसर होने के कारण वादीगण के हितों के विरुद्ध कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं रखते हैं। साथ ही प्रतिवादीगण को आदेश दिया जाता है की वे प्रदर्श-1 व 2 दस्तावेजों के आधार पर वादग्रस्त भूमि अन्य किसी व्यक्ति को विक्रय-पत्र, वसीयत या मुख्त्यारनामा आम अथवा पट्टे व अन्य किसी माध्यम से अंतरित नहीं करें और नियम-विरुद्ध पट्टे जारी नहीं करें। खर्चा अपील पक्षकारान अपना-अपना वहन करेंगे। तदनुसार डिक्री पर्चा बनाया जावे।
33. संलग्न प्रार्थना-पत्र, यदि कोई लम्बित हों, वे भी निस्तारित किये जाते हैं।
34. इस निर्णय की प्रति के साथ विद्वान विचारण न्यायालय का अभिलेख अविलम्ब लौटाया जावे।
(CHANDRA PRAKASH SHRIMALI),J
Sundarya (since deceased, through LRs) & Ors. v. Sanyukat Grah Nirman Sahkari Samiti Limited, Jaipur & Ors.
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