Tuesday, 3 November 2026

Simbhu Singh v. State of Rajasthan

2026:RJ-JP:44339-DB · Rajasthan High Court · 30 October 2026

D.B. Criminal Appeal (Db) No. 498/2018

The text below is reproduced from the judgment for reference. The article summarises the Court's decision; refer to the original judgment for the authoritative text.

[2026:RJ-JP:44339-DB]

HIGH COURT OF JUDICATURE FOR RAJASTHAN
BENCH AT JAIPUR

D.B. Criminal Appeal (Db) No. 498/2018
CNR: RJHC021211312018 | URN: CRLAD / 751U / 2018

Simbhu Singh (At Present Serving Sentence At Central Jail, Jaipur, Raj.) ----Accused-Appellant
Versus
The State Of Rajasthan through the public procecutor. ----Respondent

For Appellant(s): Mr. Sudhir Jain, Adv., Mr. Yatharth Agarwal, Adv., Mr. Monu Kumar, Adv., Mr. Parth Sharma, Adv., Mr. Saurabh Jain, Adv., Mr. Aman Yadav, Adv., Mr. Parth Vashitha, Adv.
For Respondent(s): Mr. Amit Punia, PP

[NyayVidhan notes: Stored from the official Rajasthan High Court PDF of the judgment (hcraj file 203000004982018_13.pdf, 12 pages, uploaded 02.11.2026). (1) The judgment is written in Hindi; the name 'Subramaniam (Supra)' and the extract from the Supreme Court's judgment in paragraph 18 are in English. The Hindi text is set in the legacy Kruti Dev font in the PDF and was converted to Unicode Devanagari by NyayVidhan and checked against the rendered pages; the dashes of the print appear as hyphens and the slashes in dates and case numbers as '/'. Conversion marks were mended: the visarga in 'अतः', 'प्रातः' and 'छः' (six places), 'लगभग' (paragraph 2) and 'उन्हें' (paragraph 12); the abbreviation in paragraph 1 is stored as printed, 'द.प्रं.सं.'. (2) The Court's own paragraph numbers 1-21 are kept. The sentence table in paragraph 1 is reproduced as rows separated by '|'. The English extract in paragraph 18 (paragraphs 23 and 24 of the report, with the passages they quote) is kept inside the paragraph and divided only at the report's own paragraph marks ('23-', '24-', '31-' to '34-'); the digits after 'Trimukh Maroti Kirkan vs. State of Maharashtra' and 'Mir Mohammad Omar' inside it are footnote markers of the report quoted, and the footnotes are not printed in the judgment. Paragraph 18 refers to 'Subramaniam (Supra)', but no earlier paragraph of this judgment cites Subramaniam, and no citation for it is printed. (3) The text is otherwise as printed, including 'भा.दं.स.' (paragraph 4), 'झूंठा' (paragraphs 5 and 7), 'हमनें' (paragraph 9), 'उक्त समक्ष साक्षीगण' (paragraph 13), 'कि उपस्थिति' (paragraph 15), 'procecutor' in the cause title and the quotation marks closing the English extract. (4) NyayVidhan has withheld the names of the appellant's two deceased daughters, shown as '[name withheld]' (the judgment calls them 'बच्चियों' and does not give their ages). The cause title is abridged: the appellant's parentage and address are omitted. (5) The judgment prints no 'Reportable' mark and no reserved or pronouncement date other than '30/10/2026'. (6) Page furniture (QR codes, page numbers, running heads, upload/download stamps, the staff line and the TCPDF line) is removed. The PDF is authoritative.]

[Source: Rajasthan High Court, hcraj.nic.in — judgment dated 30 October 2026.]

HON'BLE MR. JUSTICE MAHENDAR KUMAR GOYAL
HON'BLE MR. JUSTICE BHUWAN GOYAL

Judgment

30/10/2026

(PER HON'BLE BHUWAN GOYAL, J.)

1. अपीलार्थी-अभियुक्त शिम्भू सिंह द्वारा हस्तगत अपील अंतर्गत धारा 374 द.प्रं.सं. के तहत विद्वान विचारण न्यायालय अपर जिला एवं सेशन न्यायाधीश, दूदू, जिला जयपुर द्वारा सेशन प्रकरण संख्या 14/2018 (27/2014), उनवानी प्रकरण राजस्थान राज्य बनाम शिम्भू सिंह में पारित निर्णय एवं दण्डादेश दिनांक 31-07-2018 के विरूद्ध प्रस्तुत की गई है, जिसके द्वारा विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा अपीलार्थी-अभियुक्त को अपराध अंतर्गत धारा 302 भा.दं.सं. के आरोप में दोषसिद्ध किया जाकर निम्नानुसार दण्डित किया गया है:-

धारा | सजा | अर्थदण्ड | अदम अदायगी अर्थदण्ड
302 भा.दं.सं. | आजीवन कारावास | 5,000/- रुपए | 06 माह का अतिरिक्त कठोर कारावास

2. संक्षेप में प्रकरण के तथ्य इस प्रकार से हैं कि परिवादी भगवान सिंह (पी.ड.-4) ने दिनांक 11-01-2014 को थानाधिकारी पुलिस थाना दूदू, जिला-जयपुर ग्रामीण के समक्ष एक तहरीरी रिपोर्ट (प्रदर्श पी.-4) इस आशय की पेश की कि आज दिनांक 11-01-2014 को सुबह लगभग 9 बजे की बात है कि वह कल्याण सिंह राजपूत के घर पर नुक्ता के कार्यक्रम में मौजूद था, वहां पर छोटू सिंह राजपूत भी मौजूद था। नुक्ते में आई कुछ औरतों ने बताया कि शिम्भू सिंह अपनी औरत मनोहर कंवर के साथ झगड़ रहा है। इस पर वह तथा छोटू सिंह भागकर छोटूसिंह के मकान की तरफ आए तो मुख्य दरवाजे के अंदर शिम्भू सिंह खड़ा मिला जिसके कपड़ों पर खून लगा था, जिसने बताया कि उसने उसकी पत्नी तथा दोनों लड़कियों को कुल्हाड़ी से काट कर मार दिया है। तब कमरे में जाकर देखा तो शिम्भू सिंह की पत्नी मनोहर कंवर पलंग पर तथा लड़की [name withheld] व [name withheld] फर्श पर खून से लथपथ मरी हुई पड़ी मिली, उन्होंने शिम्भू सिंह से कहा तूने यह क्या कर दिया तो उसने कहा कि मैंने जिन्दगी से परेशान होकर तीनों को मारा है और वहां से भाग गया। उसने शिम्भू सिंह के ससुराल फोन करके बता दिया इत्यादि......।

3. उक्त तहरीरी रिपोर्ट (प्रदर्श पी.-4) के आधार पर पुलिस थाना-दूदू, जिला जयपुर ग्रामीण द्वारा प्रथम सूचना रिपोर्ट संख्या 11/2014, अन्तर्गत धारा 302 भा.दं.सं. में 11.00 एएम पर दर्ज कर अनुसंधान प्रारंभ किया गया। बाद अनुसंधान अपीलार्थी-अभियुक्त के विरूद्ध अपराध अन्तर्गत धारा 302 भा.दं.सं. में आरोप पत्र न्यायालय न्यायिक मजिस्ट्रेट, प्रथम वर्ग, दूदू, जिला जयपुर (राज.) के समक्ष पेश किया गया है, जिस पर विचारण न्यायालय द्वारा प्रसंज्ञान लिया जाकर प्रकरण दर्ज रजिस्टर किया गया एवं मामला सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय होने से उसे विधिवत सुनवाई हेतु न्यायालय अपर जिला एवं सेशन न्यायाधीश, सांभरलेक को कमिट कर प्रेषित किया गया, जो कालांतर में अंतरित होकर न्यायालय अपर जिला एवं सेशन न्यायाधीश, दूदू, जिला जयपुर को प्राप्त हुआ।

4. विद्वान विचारण न्यायालय ने तत्पश्चात् बहस चार्ज सुनकर अपीलार्थी-अभियुक्त के विरूद्ध धारा 302 भा.दं.स. में दण्डनीय अपराध का आरोप पृथक से विरचित कर उसे सुनाया व समझाया गया तो उसने आरोप को अस्वीकार कर अन्वीक्षा चाही, जिस पर अभियोजन पक्ष की ओर से मौखिक साक्ष्य में गवाहान पी.ड.-1 लगायत पी.ड.-30 के बयान लेखबद्ध करवाये गये तथा मौखिक साक्ष्य के समर्थन में दस्तावेजात प्रदर्श पी-1 लगायत प्रदर्श पी-93 पेश कर प्रदर्शित करवाए गए।

5. विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा तत्पश्चात् अभियुक्त को धारा 313 दं.प्र.सं. के तहत परीक्षित किया गया, जिसमें अभियुक्त ने अभियोजन साक्ष्य को गलत होना बताया एवं स्वयं का घटना के समय मौके पर नहीं होना और आपसी रंजिशवश झूंठा फंसाया जाना कथन किया एवं पर्याप्त अवसर दिए जाने के बावजूद भी प्रतिरक्षा में कोई साक्ष्य पेश नहीं कर दस्तावेजी साक्ष्य में बयान 164 दं.प्र.सं. प्रदर्श डी.-1 प्रदर्शित करवाया गया।

6. विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा उभयपक्षों को सुनने के पश्चात् अपीलार्थी-अभियुक्त शिम्भू सिंह को अपराध अन्तर्गत धारा 302 भा.दं.सं. में उपरोक्त अनुसार दण्डित किया गया, जिससे व्यथित होकर अपीलार्थी-अभियुक्त के द्वारा हस्तगत अपील उसे आरोपित अपराध से दोषमुक्त किए जाने हेतु प्रस्तुत की गई है।

7. विद्वान अधिवक्ता अपीलार्थी-अभियुक्त का कथन है कि प्रकरण में प्रस्तुत प्रत्यक्षदर्शी साक्षी एवं अन्य महत्वपूर्ण साक्षीगण पक्षद्रोही घोषित हुए हैं एवं किसी भी साक्षी ने अपीलार्थी-अभियुक्त का, घटना के वक्त घटनास्थल पर मौजूद होना अथवा उसे, मृतकगण को कुल्हाड़ी से मारते देखना कथन नहीं किया है। उनका यह भी कथन है कि वह वक्त घटना, घटनास्थल पर नहीं था, उसे इस प्रकरण में झूंठा फंसाया गया है। उनका यह भी कथन है कि प्रकरण में प्रथम तो फर्द जब्ती कुल्हाड़ी एवं कपड़ों की जब्ती कार्यवाही संदेह से परे सिद्ध नहीं हुई है एवं द्वितीय उक्त कुल्हाड़ी व कपड़ों पर लगा रक्त मृतकगण का था, इस संदर्भ में भी कोई वैज्ञानिक जांच रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं हुई है। उनका कथन है कि विद्वान विचारण न्यायालय ने उक्त सभी बिन्दुओं की अनदेखी करते हुए आलोच्य निर्णय दिनांक 31-07-2018 पारित किया है, जो कि विधि-सम्मत नहीं है। अतः अपील अपीलार्थी-अभियुक्त स्वीकार करते हुए, अपीलार्थी-अभियुक्त को आरोपित अपराध से दोषमुक्त किया जावे।

8. विद्वान लोक अभियोजक द्वारा प्रस्तुत अपील का विरोध करते हुए कथन किया गया कि विद्वान विचारण न्यायालय ने पत्रावली पर प्रस्तुत साक्ष्य का सूक्ष्मता से एवं गहनता से अवलोकन कर आलोच्य आदेश पारित किया है, उसमें किसी प्रकार की कोई विधिक एवं तथ्यात्मक त्रुटि नहीं है, अतः अपील अपीलार्थी-अभियुक्त अस्वीकार कर खारिज की जावे।

9. हमनें अपीलीय पत्रावली का मय अभिलेख का सम्मानपूर्वक अवलोकन किया तथा उभयपक्ष के तर्कों पर गंभीरतापूर्वक मनन किया।

10. हस्तगत प्रकरण में अभियोजन पक्ष का यह केस रहा है कि अपीलार्थी-अभियुक्त ने दिनांक 11.01.2014 को प्रातः 9.00 एएम पर वाके ग्राम चान्दरमूल में अपनी पत्नी मनोहर कंवर, पुत्री कुमारी [name withheld] एवं कुमारी [name withheld] की कुल्हाड़ी से काटकर हत्या कारित की ?

11. हस्तगत प्रकरण में अभियोजन कहानी अनुसार सुगन कंवर जो कि मृतका की सास है, उसका वक्त घटना घटनास्थल पर मौजूद होना बताया गया है, उसे बतौर साक्षी पी.ड.-17 प्रत्यक्षदर्शी साक्षी परीक्षित करवाया गया है, किंतु उक्त गवाह पक्षद्रोही घोषित हुई है एवं उसने अपने बयानों में अभियोजन कहानी की लेशमात्र भी पुष्टि नहीं की है, उक्त गवाह ने अपनी मुख्य परीक्षा घटना घटने के दिन उसका उसके पति के साथ कल्याण सिंह के नुक्ते में गया होना, शिम्भू सिंह का उस रोज घर पर नहीं होना कथन करते हुए अपनी प्रतिपरीक्षा में उनके घर घटना कैसे घटी उसे पता नहीं होना, शिम्भू सिंह द्वारा, मनोहर कंवर, [name withheld] एवं [name withheld] को मारने की बात गलत होना एवं उन्हें किसने मारा उसे पता नहीं होना कथन किया है।

12. हस्तगत प्रकरण में अभियोजन कहानी अनुसार साक्षी पी.ड.-4 भगवान, पी.ड.-12 नरेन्द्र सिंह, पी.ड.-14 छोटू सिंह को घटना की जानकारी मिलने पर उनके घटनास्थल पर जाने पर उनके द्वारा वहां अपीलार्थी-अभियुक्त को कुल्हाड़ी लिए देखना एवं उसके द्वारा उन्हें जिन्दगी से परेशान होकर, अपनी पत्नी मनोहर कंवर, पुत्री [name withheld] व [name withheld] की हत्या की बात कथन करना बताया गया है, किंतु प्रकरण में उक्त तीनों साक्षीगण भी अभियोजन पक्ष की प्रार्थना पर पक्षद्रोही घोषित हुए हैं एवं उन्होंने अपने-अपने बयानों में उपरोक्त अभियोजन कहानी की पुष्टि नहीं की है। साक्षी पी.ड.-4 भगवान सिंह ने अपनी मुख्य परीक्षा में उसे घटना के संदर्भ में कुछ भी पता नहीं होना कथन करते हुए अपनी प्रतिपरीक्षा में रिपोर्ट प्रदर्श पी.-4 उसके द्वारा नहीं लिखवाना, उस पर उसका अंगूठा पुलिस द्वारा खाली कागज पर लगवाना एवं रिपोर्ट प्रदर्श पी.-4 की आई से जे इबारत उसके द्वारा नहीं लिखना कथन किया है यद्यपि साक्षी पी.ड.-8 प्रहलाद सिंह ने अपनी मुख्य परीक्षा में उसे गांव के लोगों द्वारा दिनांक 11-01-2014 को सूचना देने पर, उसका गांव चान्दरमूल में घटनास्थल पर जाना, वहां भगवान सिंह द्वारा उसे पुलिस में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवाने हेतु कहने पर उसके द्वारा भगवान सिंह के कहे अनुसार रिपोर्ट प्रदर्श पी.-4 लिखना कथन किया गया है, किंतु उसका उक्त कथन विश्वसनीय होना प्रकट नहीं होता है क्योंकि साक्षी पी.ड.-4 भगवान सिंह अपने न्यायालय के समक्ष सशपथ कथनों में प्रहलाद से रिपोर्ट लिखवाने के संदर्भ में कोई कथन नहीं कर अपनी प्रतिपरीक्षा में उसके द्वारा रिपोर्ट लिखवाने से इनकार करते हुए पुलिस द्वारा प्रदर्श पी.-4 पर उसका अंगूठा खाली कागज पर लगवाना कथन करता है। प्रकरण में यह भी महत्वपूर्ण है कि साक्षी पी.ड.-8 प्रहलाद सिंह ने उसके द्वारा रिपोर्ट लगभग 12.00 बजे लिखकर देना कथन किया है, किंतु तहरीरी रिपोर्ट प्रदर्श पी.-4 के पीछे अंकित कार्यवाही पुलिस से प्रथम सूचना रिपोर्ट प्रदर्श पी.-4 का 11.00 एएम पर ही दर्ज हो जाना प्रकट होता है। इस संदर्भ में अन्य साक्षी पी.ड.-12 नरेन्द्र सिंह ने भी अपने बयानों में अभियोजन कहानी की पुष्टि नहीं करते हुए, उसका वक्त घटना कल्याण सिंह के नुक्ते में गया होना एवं, उसके घर से चिल्लाने की आवाज सुनने पर उसका घर जाना, उसके द्वारा घटना के बारे में किसी से नहीं सुनना, घटना कैसे घटी व उन तीनों की मृत्यु कैसे हुई पता नहीं होना, उसकी भाभी मनोहर कंवर, [name withheld] व [name withheld] की हत्या शिम्भू सिंह द्वारा करने की बात गलत होना, शिम्भू सिंह का वहां नहीं होना एवं बयान प्रदर्श डी.-1 पुलिस के दबाव में देना कथन किया है। साक्षी पी.ड.-14 छोटू सिंह ने भी अपने बयानों में उसका घटना के दिन कल्याण सिंह के घर नुक्ते के कार्यक्रम में होना एवं उसके द्वारा घटनास्थल पर जाने पर कुछ नहीं देखना कथन किया है, जिससे उक्त समस्त गवाहान के कथनों से हस्तगत प्रकरण में अभियोजन कहानी संदेह से परे सिद्ध नहीं हो पाती है।

13. हस्तगत प्रकरण में अन्य प्रस्तुत साक्षी पी.ड.-15 गुमान कंवर, पी.ड.-16 तेज कंवर, पी.ड.-18 दाख कंवर, पी.ड.-19 शेर सिंह, पी.ड.-20 प्रहलाद सिंह की साक्ष्य पर यदि विचार करें तो उक्त सभी साक्षीगण भी अभियोजन कहानी की प्रार्थना पर पक्षद्रोही घोषित हुए हैं एवं उन सभी ने भी अपने-अपने बयानों में अभियोजन कहानी की पुष्टि नहीं की है। गवाह गुमान कंवर ने अपने बयानों में उसका छोटू सिंह के घर की तरफ नहीं जाना एवं उसे मनोहर कंवर, [name withheld], [name withheld] को शिम्भू सिंह द्वारा मारने की बात, किसी भी व्यक्ति द्वारा नहीं बताना कथन किया है। गवाह तेज कंवर ने भी उसके द्वारा घटना के बारे में कुछ नहीं सुनना एवं मनोहर कंवर, [name withheld] व [name withheld] को किसने मारा उसे पता नहीं होना कथन किया है। गवाह दाख कंवर ने भी अपने बयानों में उसके द्वारा कुछ नहीं सुनना एवं घटना नहीं देखना एवं शिम्भू सिंह को, मनोहर कंवर एवं उसकी बच्चियों को मारते नहीं देखना कथन किया गया है। गवाह पी.ड.-19 शेर सिंह ने भी अपने बयानों में नरेन्द्र का फोन आने पर, उसका मारूती वैन लेकर नरेन्द्र के चान्दरमूल वाले घर पर जाना वहां नरेन्द्र एवं गांव के लोगों का मिलना, उनके द्वारा उसे एक औरत व दो बच्चियों को अस्पताल ले जाने की बात कहना एवं शिम्भू सिंह को घटनास्थल पर नहीं देखना मात्र कथन किया है, उसने घटना देखने अथवा सुनने के बारे में कोई कथन नहीं किया है। गवाह पी.ड.-20 प्रहलाद सिंह ने भी अपने बयानों में अभियोजन कहानी की पुष्टि नहीं करते हुए उसका घटना के दिन कल्याण सिंह के नुक्ते में होना, मनोहर कंवर, [name withheld] व [name withheld] को किसने मारा उसे पता नहीं होना एवं उसके द्वारा मनोहर कंवर, [name withheld] व [name withheld] को किसी के द्वारा मारते नहीं देखना कथन किया है, जिससे हस्तगत प्रकरण में उक्त समक्ष साक्षीगण के कथनों से भी अभियोजन कहानी युक्तियुक्त संदेह से परे सिद्ध नहीं हो पाई है।

14. हस्तगत प्रकरण में अब यदि परिस्थितिजन्य साक्ष्य का अवलोकन करें तो अभियोजन कहानी अनुसार, अपीलार्थी-अभियुक्त से उसकी सूचना पर घटना में प्रयुक्त खून-आलूदा लोहे की कुल्हाड़ी जरिये फर्द प्रदर्श पी.-18 बाड़े से साक्षी पी.ड.-9 हुकम सिंह एवं पी.ड.-10 उगम सिंह की उपस्थिति में जब्त करना बताया गया है, किंतु उक्त फर्द के साक्षी पी.ड.-10 उगम सिंह ने उक्त फर्द जब्ती प्रदर्श पी.-18 पर हस्ताक्षर थाने में करवाना कथन किया है, साथ ही नक्शा प्रदर्श पी.-19 के अवलोकन से बरामदगी स्थल खुला स्थान होना भी प्रकट होता है। अनुसंधान अधिकारी पी.ड.-29 कालूराम मीणा ने भी इस संदर्भ में अपनी प्रतिपरीक्षा में बाड़े के पास आम रास्ता होकर बाड़े में हर कोई आदमी का आ-जा सकना स्वीकार किया है, जिसमें बरामदगी स्थल अभियुक्त के एकल स्वामित्व व कब्जेशुदा होने की बात युक्तियुक्त संदेह से परे सिद्ध नहीं हो पाती है। प्रकरण में यह भी महत्वपूर्ण है कि उक्त कुल्हाड़ी को दिनांक 12-01-2014 जब्त करना बताया गया है, परंतु मालखाना रजिस्टर प्रदर्श पी-75ए के अवलोकन से उसका मालखाने में दिनांक 11-01-2014 को ही जमा होना प्रकट होता है। मालखाना इंचार्ज पी.ड.-27 धन्नालाल ने भी इस संदर्भ में अपने बयानों में उसे अनुसंधान अधिकारी द्वारा दिनांक 11-01-2014 को ही 12 सील्डशुदा पैकेट मालखाना में रखने हेतु देने का कथन किया है, उसने उक्त कुल्हाड़ी उसे दिनांक 12-01-2014 को जमा कराने हेतु देने के संदर्भ में कोई कथन नहीं किया है। उक्त कुल्हाड़ी दिनांक 12-01-2014 के स्थान पर दिनांक 11-01-2014 को मालखाने में कैसे व किस कारण से जमा हुई इस संबंध में अभियोजन साक्ष्य पूर्णतया मौन है। प्रकरण में यह भी महत्वपूर्ण है कि उक्त कुल्हाड़ी पर लगा रक्त मृतकगण का था, इस संदर्भ में भी कोई वैज्ञानिक जांच रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं हुई है।

15. हस्तगत प्रकरण में अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्य के रूप में अपीलार्थी-अभियुक्त से उसकी सूचना पर, उसके वक्त घटना पहने हुए कपड़ों को जरिये फर्द जब्ती प्रदर्श पी-22 साक्षी पी.ड.-13 महावीर प्रसाद एवं साक्षी पी.ड.-24 सुभाष चन्द कि उपस्थिति में जब्त किया जाना बताया गया है, किंतु उक्त फर्द के उक्त दोनों साक्षीगण प्रथम तो स्वतंत्र साक्षी नहीं होकर पुलिस कार्मिक हैं द्वितीय प्रकरण में उक्त कार्यवाही के समय मौके पर स्वतंत्र साक्षीगण उपस्थित नहीं होने या उनके द्वारा उक्त कार्यवाही पर हस्ताक्षर करने से इनकार करने के संदर्भ में भी कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं हुई है एवं प्रकरण में उक्त दोनों साक्षीगण के दिनांक 11-01-2014 को उक्त जब्ती स्थल पर जाने के संदर्भ में भी ना तो उक्त दिनांक का रोजनामचा रपट प्रस्तुत हुई हैं ना ही वाहन लॉग-शीट प्रस्तुत हुई है एवं उक्त कपड़ों पर लगा रक्त, मृतकगण का होने के संदर्भ में भी मृतकगण के रक्त समूह रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं हुई है, जिससे हस्तगत प्रकरण में जहां उक्त फर्दात कार्यवाही जहां संदेह से परे सिद्ध नहीं हो पाई है साथ ही कुल्हाड़ी व कपड़ों पर मृतकगण का रक्त लगे होने बाबत् अभियोजन कहानी भी संदेह से परे सिद्ध नहीं होने से अभियोजन कहानी की कड़ीबद्ध श्रृंखला नहीं बन पाई है।

16. हस्तगत प्रकरण में जहां तक विद्वान लोक अभियोजक के इस तर्क का संबंध है कि घटना के वक्त घटनास्थल पर अपीलार्थी-अभियुक्त व मृतकगण साथ-साथ रिहाइश कर रहे थे, ऐसे में अपीलार्थी-अभियुक्त का यह दायित्व था कि वह उसकी पत्नी व दोनों बच्चियों की मृत्यु किन परिस्थितियों एवं कारण से हुई उसे स्पष्ट करें, किंतु उसके द्वारा उन परिस्थितियों को स्पष्ट नहीं किया गया है, जिससे उसके विरुद्ध, उनकी हत्या करने बाबत् उपधारणा की जावे, किंतु हम उनके उक्त तर्क से सहमत नहीं हैं क्योंकि हमारी विनम्र राय में जहां अभियोजन पक्ष द्वारा मृतकगण की मृत्यु के समय अपीलार्थी-अभियुक्त के उनके साथ वहां मौजूद होने के तथ्य को अपनी साक्ष्य से युक्तियुक्त संदेह से परे सिद्ध किया गया हो एवं उक्त तथ्य अन्य प्रस्तुत साक्ष्य से समर्थित हो, केवल उसी परिस्थिति में, उक्त उपधारणा की जा सकती है।

17. हस्तगत प्रकरण में पत्रावली पर, इस संदर्भ में प्रस्तुत साक्ष्य का अवलोकन करें तो अभियोजन पक्ष की ओर से प्रस्तुत किसी भी साक्षी ने घटना के वक्त अपीलार्थी-अभियुक्त के घटनास्थल पर उपस्थित होने अथवा उसे मृतकगण के साथ कुल्हाड़ी से मारपीट करते देखना कथन नहीं किया है। गवाह पी.ड.-12 नरेन्द्र सिंह, गवाह पी.ड.-17 सुगन कंवर, पी.ड.-19 शेर सिंह ने अपने-अपने बयानों में घटनास्थल पर शिम्भू सिंह को नहीं देखना कथन किया है एवं स्वयं अपीलार्थी-अभियुक्त ने अपने धारा 313 दं.प्र.सं. के बयानों में उसका घटना के समय घर पर नहीं होना कथन किया है जिसके खंडन में भी कोई साक्ष्य पत्रावली पर प्रस्तुत नहीं हुई है एवं पत्रावली पर उसके घटनास्थल पर मौजूद रहने के संदर्भ में उसके मोबाइल लोकेशन भी प्रस्तुत नहीं हुई है, जिससे हस्तगत प्रकरण में उसके विरूद्ध उपधारणा की जाने की बात विधिसंगत प्रतीत नहीं होती है।

18. माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायिक दृष्टांत Subramaniam (Supra) के पैरा नंबर 23 एवं 24 में इस संदर्भ में यह अवधारित किया है कि-

23- So far as the circumstance that they had been living together is concerned, indisputably, the entirety of the situation should be taken into consideration. Ordinarily when the husband and wife remained within the four walls of a house and a death by homicide takes place it will be for the husband to explain the circumstances in which she might have died. However, we cannot lose sight of the fact that although the same may be considered to be a strong circumstance but that by alone in absence of any evidence of violence on the deceased cannot be held to be conclusive. It may be difficult to arrive at a conclusion that the husband and husband alone was responsible therefor.

24- Mr. Kanagaraj has placed strong reliance upon the decision of this Court in Trimukh Maroti Kirkan vs. State of Maharashtra3 wherein it was held: (SCC pp. 692-93, para 18) 18. The question of burden of proof where some facts are within the personal knowledge of the accused was examined in State of W.B. v. Mir Mohammad Omar4. In this case the assailants forcibly dragged the deceased, Mahesh from the house where he was taking shelter on account of the fear of the accused and took him away at about 2.30 in the night. Next day in the morning his mangled body was found lying in the hospital. The trial Court convicted the accused under Section 364 read with Section 34 IPC and sentenced them to 10 years’ RI. The accused preferred an appeal against their conviction before the High Court and the State also filed an appeal challenging the acquittal of the accused for murder charge. The accused had not given any explanation as to what happened to Mahesh after he was abducted by them. The learned Sessions Judge after referring to the law on circumstantial evidence had observed that there was a missing link in the chain of evidence after the deceased was last seen together with the accused persons and the discovery of the dead body in the hospital and had concluded that the prosecution had failed to establish the charge of murder against the accused persons beyond any reasonable doubt. This Court took note of the provisions of Section 106 of the Evidence Act and laid down the following principle in paras 31 to 34 of the report: (Mir Mohammad Omar case4, SCC p. 392)

31- The pristine rule that the burden of proof is on the prosecution to prove the guilt of the accused should not be taken as a fossilised doctrine as though it admits no process of intelligent reasoning. The doctrine of presumption is not alien to the above rule, nor would it impair the temper of the rule. On the other hand, if the traditional rule relating to burden of proof of the prosecution is allowed to be wrapped in pedantic coverage, the offenders in serious offences would be the major beneficiaries and the society would be the casualty.

32- In this case, when the prosecution succeeded in establishing the afore-narrated circumstances, the court has to presume the existence of certain facts. Presumption is a course recognised by the law for the court to rely on in conditions such as this.

33- Presumption of fact is an inference as to the existence of one fact from the existence of some other facts, unless the truth of such inference is disproved. Presumption of fact is a rule in law of evidence that a fact otherwise doubtful may be inferred from certain other proved facts. When inferring the existence of a fact from other set of proved facts, the court exercises a process of reasoning and reaches a logical conclusion as the most probable position. The above principle has gained legislative recognition in India when Section 114 is incorporated in the Evidence Act. It empowers the court to presume the existence of any fact which it thinks likely to have happened. In that process the court shall have regard to the common course of natural events, human conduct etc. in relation to the facts of the case.

34- When it is proved to the satisfaction of the court that Mahesh was abducted by the accused and they took him out of that area, the accused alone knew what happened to him until he was with them. If he was found murdered within a short time after the abduction the permitted reasoning process would enable the court to draw the presumption that the accused have murdered him. Such inference can be disrupted if the accused would tell the court what else happened to Mahesh at least until he was in their custody.’ ”

19. अतः पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्य व उभयपक्षों के तर्कों पर मनन के पश्चात् हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि विद्वान विचारण न्यायालय ने जो आलोच्य आदेश दिनांकित 31-07-2018 पारित किया है, वह विधिसम्मत नहीं होने से उक्त निर्णय स्थिर रखे जाने योग्य नहीं है। अतः अपील, अपीलार्थी-अभियुक्त शिम्भू सिंह स्वीकार की जाकर विद्वान विचारण न्यायालय-अपर जिला एवं सेशन न्यायाधीश, दूदू, जिला जयपुर द्वारा सेशन प्रकरण संख्या-14/2018 (27/2014), उनवानी प्रकरण राजस्थान राज्य बनाम शिम्भू सिंह में पारित निर्णय एवं दण्डादेश दिनांक-31-07-2018 को रद्द एवं अपास्त किया जाता है। अपीलार्थी-अभियुक्त शिम्भू सिंह को आरोपित अपराध अंतर्गत धारा 302 भा.दं.सं. से दोषमुक्त (बरी) किया जाता है। संबंधित जेल अधीक्षक को इस आशय की तहरीर जारी की जावे कि यदि अपीलार्थी-अभियुक्त अन्य किसी प्रकरण में वांछित ना हो तो उसे हस्तगत प्रकरण में नियमानुसार अविलम्ब रिहा किया जावे।

20. अपीलार्थी-अभियुक्त शिम्भू सिंह को निर्देशित किया जाता है कि वह पचास हजार रूपये का स्वयं का बन्ध-पत्र तथा इसी राशि की एक सुदृढ प्रतिभूति, धारा 437-क द.प्र.सं./481 बीएनएसएस के अनुसार, दोषमुक्त किए जाने के निर्णय की दिनांक से दो सप्ताह के भीतर रजिस्ट्रार (न्यायिक) राजस्थान उच्च न्यायालय पीठ जयपुर के समक्ष इस आशय की पेश करे कि इस निर्णय के विरूद्ध विशेष अनुमति याचिका दायर करने की स्थिति में या अनुमति प्रदान किये जाने की स्थिति में नोटिस की तामिल होने के पश्चात् वह माननीय उच्चतम न्यायालय के समक्ष उपस्थित होगा। उपरोक्त बंध पत्र छः माह के लिए प्रभावी रहेगा।

21. इस निर्णय की एक प्रति विचारण न्यायालय की पत्रावली के साथ विद्वान विचारण न्यायालय को भिजवाई जावे।

(BHUWAN GOYAL),J (MAHENDAR KUMAR GOYAL),J
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