HIGH COURT OF JUDICATURE FOR RAJASTHAN
BENCH AT JAIPUR
S.B. Criminal Bail Cancellation Application No. 127/2021
Mohar Singh S/o Late Shri Jawanaram, Jhunjhunu ----Petitioner
Versus
(1) Vinod @ Sunil Alias Sunny Alias Mota S/o Shri Dharmpal Singh, Jhunjhunu
(2) State of Rajasthan, through P.P. ----Respondents
For Petitioner(s): Mr. Rajpal Dhandkhar
For Respondent(s): Mr. Amin Ali; Mr. Laxman Meena, PP
HON'BLE MR. JUSTICE MADAN GOPAL VYAS
Order
15/12/2021
REPORTABLE
1. प्रार्थी-परिवादी ने दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 439(2) के अन्तर्गत यह प्रार्थना पत्र विद्वान अपर सेशन न्यायाधीश, खेतडी द्वारा विविध आपराधिक प्रार्थना पत्र संख्या 206/21 में पारित आदेश दिनांक 06.07.21 को अपास्त किये जाने हेतु प्रस्तुत किया है, जिसके द्वारा अभियुक्त विनोद उर्फ सुनील उर्फ सन्नी उर्फ मोटा की ओर से प्रस्तुत जमानत आवेदन स्वीकार करते हुए उसे जमानत का लाभ दिया गया था।
2. मैंने योग्य अधिवक्ता प्रार्थी-परिवादी, योग्य अधिवक्ता अभियुक्त तथा योग्य लोक अभियोजक की बहस सुनी तथा पत्रावली का अवलोकन किया।
3. विद्वान अधिवक्ता प्रार्थी-परिवादी ने तर्क दिया कि आक्षेपित आदेश दिनांक 06.07.21 में विद्वान अपर सेशन न्यायालय ने यह अंकित किया है कि अभियुक्त का पूर्व का आपराधिक रिकार्ड होना केस डायरी से प्रकट नहीं होता है, जबकि अभियुक्त आदतन अपराधी है और उसके विरूद्ध करीब 21 प्रकरण पंजीबद्ध/लंबित थे। अभियुक्त घटना के बाद नौ माह तक फरार रहा है। अभियुक्त जमानत की सुविधा प्राप्त होने के बाद से साक्षियों को धमकियां दे रहा है। अभियुक्त के विरूद्ध इसी घटनास्थल अर्थात परिवादी के पेट्रोल पम्प पर अपराध करने के संबंध में तीन और प्रकरण पंजीबद्ध हैं। हस्तगत प्रथम सूचना रिपोर्ट परिवादी के पेट्रोल पम्प पर चौथी घटना से संबंधित है, इसलिए अभियुक्त का जमानत आदेश दिनांक 06.07.21 अपास्त किये जाने का निवेदन किया। उन्होंने अपने तर्कों की पुष्टि में निम्नलिखित न्यायिक दृष्टान्त पेश किये, जिनका मैंने अवलोकन किया- 1. 2017 SCC Online Raj 997, State of Rajasthan Vs. Pawan Kumar 2. S.B. Criminal Misc. Bail Application No. 13269/2020 Aman @ Kuku Pahalwan & Anr. Vs. St. of Rajasthan Order Dt. 12-11-2020, By Rajasthan High Court, Bench Jaipur.
4. जबकि विद्वान अधिवक्ता अभियुक्त ने यह तर्क दिया कि विद्वान अपर सेशन न्यायाधीश, खेतडी के समक्ष जमानत आवेदन पर बहस हुई तब अभियुक्त की ओर से यह कथन नहीं किया गया कि अभियुक्त के विरूद्ध पूर्व में कोई प्रकरण पंजीबद्ध नहीं है। अभियुक्त की ओर से जमानत प्रार्थना पत्र की बहस के दौरान कोई मिथ्या कथन नहीं किया गया है। अभियुक्त के विरूद्ध जो प्रकरण पंजीबद्ध होना बताये जाते हैं, उनसे से 12 प्रकरणों में अभियुक्त दोषमुक्त हो चुका है। एक भी प्रकरण में अभियुक्त दोषसिद्ध घोषित नहीं हुआ है। परिवादी और अभियुक्त एक ही जगह के रहने वाले हैं और उनकी आपस में वैमनस्यता है। पेट्रोल पम्प और भी हैं, केवल परिवादी के पेट्रोल पम्प पर अभियुक्त द्वारा अपराध कारित किया जाना स्वाभाविक और विश्वसनीय नहीं है। परिवादी ने विधिक राय लेकर अभियुक्त को तंग करने के लिए मिथ्या प्रकरण पंजीबद्ध कराये हैं। अभियुक्त ने आदेश दिनांक 06.07.21 से प्राप्त जमानत की सुविधा का दुरूपयोग नहीं किया है। अभियुक्त ने किसी भी गवाह को कभी नहीं धमकाया। इसलिए जमानत निरस्तीकरण प्रार्थना पत्र खारिज किये जाने का निवेदन किया। उन्होंने अपने इन तर्कों की पुष्टि में निम्नलिखित न्यायिक दृष्टान्त पेश किये- 1. (1995) 1 SCC 349, Dolat Ram & Ors. Vs. State of Haryana 2. 2009(2) Cr.L.R. (Raj.) 1741, Manish Pahadia Vs. Smt. Sanju Bai & Anr.
5. मैंने उपर्युक्त परस्पर विरोधी तर्कों पर विचार किया, आक्षेपित जमानत आदेश दिनांक 06.07.21 तथा अभिलेख का अवलोकन किया। आक्षेपित आदेश दिनांक 06.07.21 के पृष्ठ-2 पर अभियुक्त की ओर से प्रस्तुत तर्क अंकित है, लेकिन अभियुक्त की ओर से यह कथन नहीं किया गया है कि अभियुक्त के विरूद्ध पूर्व से कोई प्रकरण पंजीबद्ध नहीं है। निष्कर्ष के पैरा में यह अवश्य अंकित है कि “प्रार्थी-अभियुक्त का पूर्व का कोई आपराधिक रिकार्ड होना केस डायरी से प्रकट नहीं होता है।“ इस प्रकार न्यायालय का यह मत केस डायरी पर आधारित होना दृष्टिगत होता है। अन्वेषण अधिकारी का यह कर्तव्य बनता है कि यदि किसी अभियुक्त से संबंधित कोई प्रकरण पंजीबद्ध/लंबित हो तो उसकी सूची केस डायरी के साथ संलग्न करे। हस्तगत प्रकरण में अप्रार्थी-अभियुक्त के विरूद्ध 21 प्रकरण पंजीबद्ध थे, इसलिए अन्वेषण अधिकारी का यह दायित्व बनता है कि पंजीबद्ध/लंबित प्रकरणों की सूची संलग्न पत्रावली करे, लेकिन ऐसी सूची केस डायरी में शामिल नहीं कर अन्वेषण अधिकारी ने अपने कर्तव्य के प्रति उपेक्षा व लापरवाही अवश्य बरती है।
6. कुल मिलाकर आक्षेपित जमानत आदेश दिनांक 06.07.21 में यह अंकित नहीं है कि अभियुक्त की ओर से यह कथन किया गया हो कि उसके विरूद्ध पूर्व का कोई प्रकरण पंजीबद्ध/लंबित नहीं हो। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि आक्षेपित आदेश पारित करते समय अभियुक्त की ओर से कोई मिथ्या कथन किया गया हो।
7. जहां तक पूर्व में दर्ज तीन प्रथम सूचना रिपोर्ट का घटनास्थल पेट्रोल पम्प पर होने का प्रश्न है, यह सही नहीं है क्योंकि पुलिस थाना खेतडी में दर्ज प्रथम सूचना रिपोर्ट संख्या 196/19 में घटनास्थल सैफरागुवार, खेतडी है। ये तीनों ही प्रकरण हस्तगत प्रकरण से पूर्व के हैं।
8. आक्षेपित आदेश के पश्चात अभियुक्त ने परिवादी या गवाहान को निरन्तर धमकियां दिये जाने के संबंध में सुरेन्द्र सिंह द्वारा पुलिस थाना खेतडी में दिनांक 06.09.2020 को प्रस्तुत एक रिपोर्ट की प्रति पेश की है, लेकिन रिपोर्ट दिनांक 06.09.20 में पुलिस ने क्या निष्कर्ष दिया, यह स्पष्ट नहीं किया गया है। निष्कर्ष की कोई प्रति प्रस्तुत नहीं की गयी है। अभियुक्त ने परिवादी अथवा उसके किसी गवाह को कब, कहां और किस समय धमकी दी, यह भी स्पष्ट नहीं किया गया है। अभियुक्त या उसके किसी गवाह द्वारा धमकी दिये जाने के तथ्य की पुष्टि में कोई शपथ पत्र भी प्रस्तुत नहीं किया गया है।
9. जमानत पर स्वतंत्र व्यक्ति की जमानत निरस्त करने का कठोर कदम है, क्योंकि इससे व्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित होती है। सामान्यतः जमानत तभी निरस्त की जानी चाहिए जब अभियुक्त ने साक्षियों को धमकाया हो अथवा साक्ष्य को मिटाने की या छेडछाड की कोशिश की हो अथवा सुचारू रूप से चल रहे अन्वेषण की प्रक्रिया में बाधा पहुंचाई हो, लेकिन हस्तगत प्रकरण में अभियुक्त के विरूद्ध ऐसा प्रकट नहीं होता है।
10. कुल मिलाकर परिवादी पक्ष की ओर से आक्षेपित जमानत आदेश को निरस्त कराने के संबंध में कोई सुदृढ, विश्वसनीय और विधिसम्मत आधार नहीं दर्शाया है। इसलिए उपर्युक्त विवेचन के आधार पर आक्षेपित जमानत आदेश दिनांकित 06.07.21 को निरस्त किया जाना न्यायोचित प्रतीत नहीं होता है।
11. परिणामतः प्रार्थी-परिवादी द्वारा प्रस्तुत प्रार्थना पत्र अन्तर्गत धारा 439(2) दं.प्र.सं. के बाबत् जमानत निरस्त का खारिज किया जाता है।
(MADAN GOPAL VYAS),J
उपरोक्त निर्णय/आदेश भारतीय संविधान के अनुच्छेंद 348(i) के तहत भारत सरकार की अधिसूचना राजपत्र सं. 1, दिनांक 2जनवरी, 1999 एवं राजस्थान राजपत्र दिनांकित 10.03.1971 के तहत हिन्दी भाषा के प्रयोग को प्राधिकृत किये जाने के परिणामस्वरूप मूल निर्णय हिन्दी भाषा में लिखाया गया। जिसका अनुवादक से अंग्रेजी भाषा में अनुवाद करवाकर, उसकी प्रमाणित प्रति भी संबंधित पक्षकार को दी जाए।
[NyayVidhan notes: (1) The order is written in Hindi and its paragraphs are not numbered. The numbers 1-11 were added by NyayVidhan at the order's own paragraph breaks, for reference only; they are not the Court's numbers. The two lists of authorities cited by counsel are kept inside paras 3 and 4. (2) The Hindi text is set in the legacy Kruti Dev font in the PDF and was converted to Unicode Devanagari by NyayVidhan; dates split across lines (paras 5 and 8), the visarga in सामान्यतः / परिणामतः and one vowel sign in the closing language note were mended to match the printed page. Other wording, including 'उनसे से' (para 4), is kept as printed. (3) The printed note after the signature (on the use of Hindi under Article 348 and an English translation for the parties) is reproduced unnumbered. (4) The parties' residential addresses and ages in the cause title are shortened to the district. The order carries no neutral citation. The official PDF is the authoritative text.]
Mohar Singh v. Vinod @ Sunil @ Sunny @ Mota & Anr.
The text below is reproduced from the judgment for reference. The article summarises the Court's decision; refer to the original judgment for the authoritative text.