[2026:RJ-JP:41527]
HIGH COURT OF JUDICATURE FOR RAJASTHAN
BENCH AT JAIPUR
S.B. Criminal Miscellaneous (Petition) No. 5688/2026
CNR: RJHC020823972026 | URN: CRLMP / 13953U / 2026
Smt. Usha Bhati, Beawar ----Petitioner
Versus
(1) The State of Rajasthan, through PP
(2) Beawar Urban Co-Operative Bank Limited, Beawar, through its Chief Executive Officer ----Respondents
For Petitioner(s): Mr. Manoj Kumar Chaudhary, Adv.
For Respondent(s): Mr. Devi Singh, PP
HON'BLE MR. JUSTICE UMA SHANKER VYAS
[NyayVidhan notes: stored from the official Rajasthan High Court PDF (hcraj file 203900056882026_1.pdf, 3 pages); the PDF is authoritative. (1) The order is written in Hindi in the legacy Kruti Dev font; NyayVidhan converted it to Unicode Devanagari and compared it with the printed pages. The case name and citation that the order prints in English (paras 3 and 5) are kept as printed. (2) The order's paragraphs are not numbered; the numbers 1-7 were added by NyayVidhan at the order's own paragraph breaks, for reference only. (3) The cause title is abridged: the petitioner's husband's name is omitted and her address is shortened to the town; the bank officer's name and address are omitted. (4) Spellings are kept as printed, including 'को को' (para 3), 'दुरूपयोग' (para 3), 'विरूद्ध' (paras 2, 3, 5, 6) and 'निर्णय क विरूद्ध' (para 6). No 'Reportable' mark is printed. Page furniture (running heads, page numbers, upload/download stamps, staff initials, TCPDF line) is removed.]
[Source: Rajasthan High Court, hcraj.nic.in — order dated 08.10.2026.]
Judgment / Order
08/10/2026
1. याची/अभियुक्त द्वारा विद्वान विशिष्ट न्यायिक मजिस्ट्रेट (एन आई एक्ट प्रकरण) ब्यावर द्वारा आपराधिक प्रकरण संख्या 7728/2015 में पारित निर्णय दिनांक 24.06.2026 से व्यथित होकर यह याचिका धारा 528 बी एन एस एस के तहत प्रस्तुत की, आक्षेपित निर्णय के माध्यम से अभियुक्त को धारा 138 एन आई एक्ट के आरोप में दोषसिद्ध करार देते हुए दो वर्ष के साधारण कारावास तथा 1,40,000/-रूपये के अर्थदण्ड से दंडित किया गया है।
2. कार्यालय द्वारा यह आक्षेप लगाया गया है कि दोषसिद्धि के निर्णय के विरूद्ध सीधे ही धारा 528 बी एन एस एस के तहत याचिका पोषणीय नहीं है। इस आपत्ति पर विद्वान अधिवक्ता याची/अभियुक्त को सुना गया एवं अभिलेख का अवलोकन किया गया।
3. विद्वान अधिवक्ता याची/अभियुक्त का निवेदन है कि परिवादी द्वारा वास्तविक व सही तथ्यों को को छुपाकर गलत तथ्य विचारण न्यायालय के समक्ष रखे गये और उसके आधार पर अभियुक्त को दोषसिद्ध व दंडित किया गया है। उनका यह भी निवेदन है कि वर्तमान अभियुक्त/प्रार्थी के विरूद्ध कुल 19 आपराधिक प्रकरण इसी आशय के अलग अलग चैक के संबंध में दर्ज हुए हैं तथा सभी में संबंधित न्यायालय द्वारा एक ही दिन में दोषसिद्धि व दण्डादेश के निर्णय पारित किये गये हैं, जो विधि सम्मत नहीं है, न्यायिक व कानूनी प्रक्रिया का दुरूपयोग है। अपने तर्कों के संबंध में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Rekha Sharad Ushir VS. Saptashrungi Mahila Nagrik Sahkari Patsansta Ltd. 2025 INSC 399 प्रस्तुत किया है।
4. माननीय सर्वोच्च न्यायालय के उपरोक्त निर्णय में अभियुक्त की अनुपस्थिति में प्रसंज्ञान आदेश धारा 138 एन आई एक्ट के आरोप में संबंधित मजिस्ट्रेट न्यायालय द्वारा पारित किया गया था और प्रस्तुत व स्वीकृत दस्तावेजों के अनुसार यह स्थिति स्पष्ट हुई है कि परिवादी द्वारा वास्तविक तथ्यों को छुपाया गया, यदि उन तथ्यों को नहीं छुपाया जाता तो प्रसंज्ञान आदेश पारित नहीं होता और उसके आधार पर प्रसंज्ञान आदेश को अपास्त किया गया है।
5. वर्तमान मामले में अभियुक्त के विरूद्ध प्रसंज्ञान आदेश पारित होने के बाद अभियुक्त को विचारण में प्रतिपरीक्षा व बचाव का अवसर दिया गया था और उसकी उपस्थिति में विचारण पूर्ण होने के बाद दिनांक 24.06.2026 का निर्णय पारित हुआ है, अतः ऐसी स्थिति में तथ्यों में भिन्नता के कारण से माननीय सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय Rekha Sharad Ushir VS. Saptashrungi Mahila Nagrik Sahkari Patsansta Ltd. (पूर्वोक्त) हस्तगत प्रकरण पर लागू नहीं होता है।
6. विद्वान अधिवक्ता अभियुक्त का यह भी निवेदन है कि विचारण न्यायालय द्वारा परिवादी के पक्ष में उपधारणा आदि के संबंध में गलत निष्कर्ष निकाला गया है, इस प्रकार की आपत्ति अपीलीय न्यायालय के समक्ष उठायी जा सकती है। पारित निर्णय क विरूद्ध अपील का विधायी प्रावधान उपलब्ध है, अतः ऐसी स्थिति में अपील के स्थान पर सीधे ही धारा 528 बी एन एस एस के तहत यह याचिका स्वीकार किये जाने योग्य नहीं है।
7. परिणामतः सभी आपत्तियां अपीलीय न्यायालय के समक्ष उठाये जाने की स्वतंत्रता के साथ यह याचिका पोषणीय नहीं होने से निस्तारित की जाती है।
(UMA SHANKER VYAS),J
Smt. Usha Bhati v. State of Rajasthan & Anr.
The text below is reproduced from the judgment for reference. The article summarises the Court's decision; refer to the original judgment for the authoritative text.