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Thursday, October 29, 2026

Praveen Arora v. Union of India (through CBI)

2026:RJ-JD:52470 · Rajasthan High Court · 27 October 2026

S.B. Criminal Miscellaneous Bail Application No. 12166/2026

The text below is reproduced from the judgment for reference. The article summarises the Court's decision; refer to the original judgment for the authoritative text.

[2026:RJ-JD:52470]

HIGH COURT OF JUDICATURE FOR RAJASTHAN
AT JODHPUR

S.B. Criminal Miscellaneous Bail Application No. 12166/2026
CNR: RJHC010919062026 | URN: CRLMB / 26520U / 2026

Praveen Arora ----Petitioner
Versus
Union of India, Through Special Public Prosecutor For Central Bureau of Investigation. ----Respondent

For Petitioner(s): Mr. Ravi Bhansali, Sr. Advocate with Mr. Shubham Modi, Mr. Vipul Dharnia
For Respondent(s): Mr. P.C. Solanki, Special Public Prosecutor for Union of India; Mr. Vanay Singh Meena, Dy.S.P., C.B.I. Jodhpur

[NyayVidhan notes: Stored from the official Rajasthan High Court PDF of the order (hcraj file 205300121662026_3.pdf, 6 pages, uploaded 27.10.2026). (1) The order is written in Hindi. Its text is set in the legacy Kruti Dev font in the PDF and was converted to Unicode Devanagari by NyayVidhan and checked against the rendered pages; the dashes of the print appear as hyphens. Conversion marks were mended: 'फ्रॉड' (paragraphs 04, 05 and 07), the visarga in 'अतः' (paragraphs 03, 04 and 09), 'पुनः' (paragraph 04) and 'परिणामतः' (paragraph 10), and a doubled vowel sign in 'वर्षों' (paragraph 07). (2) The first paragraph carries no number in the print; the Court's own numbers 02-10 follow and are kept as printed, with a leading zero for 02-09. The date block before the first paragraph is numbered 1-4 in the print; it is stored without those numbers. (3) The cause title is abridged: the petitioner's parentage, age and address are omitted. (4) Withheld by NyayVidhan: the names of nine witnesses in paragraph 07, marked '[names withheld]' and '[name withheld]'; persons named as accused or alleged participants are kept as printed. (5) The text is otherwise as printed, including 'सुत्र सूचना' and 'संव्यहार' (paragraph 05), 'फाइनेंशिय' and 'गवाह प्रवीण अरोड़ा ने' (paragraph 07; the petitioner is so described in the print), and 'अपावादत्मक' (paragraph 08). (6) Page furniture (QR codes, page numbers, running heads, upload/download stamps, the staff lines and the TCPDF line) is removed. The PDF is authoritative.]

[Source: Rajasthan High Court, hcraj.nic.in — order dated 27.10.2026.]

HON'BLE MR. JUSTICE CHANDRA SHEKHAR SHARMA

Order

Date of conclusion of arguments: 13.10.2026
Date on which the order was reserved: 13.10.2026
Whether the full order or only operative part is pronounced: Full Order
Date of Pronouncement: 27.10.2026

प्रार्थी अभियुक्त प्रवीण अरोड़ा की ओर से यह अग्रिम जमानत आवेदन धारा 482 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन पुलिस थाना सीबीआई/एसीबी, जोधपुर में दर्ज प्रथम सूचना रिपोर्ट संख्या RCJDH 2026 A 0002, अपराध अन्तर्गत धारा 61(2) सपठित धारा 318, 336 व 340 भारतीय न्याय संहिता एवं धारा 13(2) सपठित धारा 13(1)(A) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के मामले में प्रस्तुत हुआ है।

02. मैंने योग्य अधिवक्ता प्रार्थी अभियुक्त व योग्य लोक अभियोजक की बहस सुनी एवं अभिलेख का अवलोकन किया।

03. योग्य अधिवक्ता प्रार्थी अभियुक्त ने मुख्य रूप से यह तर्क दिए कि अब तक के अनुसंधान से प्रार्थी को प्रकरण में मात्र इसी कारण से अभियुक्त बनाया गया है कि वह किरायेनामा का गवाह है, परंतु वर्तमान प्रथम सूचना रिपोर्ट में वह किसी भी किरायेनामा का गवाह भी नहीं है। उसके द्वारा न तो किसी दस्तावेज को रचा गया था और न ही उसे असली के रूप में प्रयोग में लिया गया है। प्रथम सूचना रिपोर्ट में यह भी अंकित नहीं है कि प्रार्थी द्वारा किसी प्रकार की राशि को अपने खाते में जमा किया गया हो अथवा कोई कमीशन, धन संबंधी लाभ प्राप्त किया गया हो। वह जांच में पूर्ण सहयोग करने को भी तैयार है। पूर्व में वह अनुसंधान हेतु उपस्थित भी होता रहा है। प्रारंभिक जांच के दौरान प्रार्थी के आवासीय परिसर की तलाशी भी ली गई, लेकिन तलाशी के बावजूद भी उसके मोबाइल फोन तथा अन्य वस्तुएं जब्ती की बावजूद जांच एजेंसी प्रार्थी को अपराध से जोड़नेवाली कोई भी सामग्री बरामद करने में विफल रही है। स्पष्टतया अभिलेख पर ऐसी कोई साक्ष्य नहीं है, जिससे उसके विरुद्ध आक्षेपित अपराध बनता हो। एक अन्य प्रथम सूचना रिपोर्ट संख्या 0003/2026 को भी प्रार्थी द्वारा चुनौती देने पर इस न्यायालय की समकक्ष पीठ द्वारा गिरफ्तारी पर रोक भी लगाई गई। केवल गलत तथ्यों के आधार पर अप्रार्थी पक्ष उसे गिरफ्तार करना चाहता है। प्रार्थी अभियुक्त अन्वेषण में पूर्ण सहयोग करने को तैयार है। अतः ऐसी परिस्थितियों में प्रार्थी अभियुक्त को अग्रिम जमानत का लाभ दिए जाने का निवेदन किया।

04. इसके विपरीत उक्त तर्कों के खंडन में योग्य विशेष लोक अभियोजक ने यह तर्क दिए कि प्रथम सूचना रिपोर्ट में जिन 04 म्यूल चालू बैंक खातों का विवरण दिया गया है, उन बैंक खातों से 537 करोड़ रुपयों का विभिन्न बैंकिंग डिजिटल प्लेटफार्मों के माध्यम से संव्यवहार हुआ है। प्रार्थी ने बैंक अधिकारी एवं अन्य सहअभियुक्तगण के साथ मिलकर इनके संचालन में किराये के परिसर की भी व्यवस्था की और जी.एस.टी. रजिस्ट्रेशन करवाया, साथ ही बैंक खाते खुलवाने में पूर्ण रूप से सहयोग भी किया था। प्रकरण अभी अनुसंधान स्तर पर है और प्रार्थी से अनुसंधान किए जाने की भी आवश्यकता है। पूर्व में जब प्रारंभिक स्तर पर जांच की जा रही थी, उसके पश्चात अब प्रार्थी को पुनः अनुसंधान हेतु बुलाए जाने पर सूचना पत्र की तामील होने के बावजूद वह अनुसंधान अधिकारी के समक्ष उपस्थित नहीं हो रहा है। अब तक के अनुसंधान से प्रार्थी के विरुद्ध प्रथमदृष्टया अपराध अंतर्गत धारा 61(2) सपठित धारा 318, 336 व 340 भारतीय न्याय संहिता एवं धारा 13(2) सपठित धारा 13(1)(A) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम का प्रमाणित पाया गया है, जिससे प्रार्थी की अनुसंधान में आवश्यकता भी है। प्रकरण में काफी बड़ी राशि के जो संव्यवहार किए गए हैं, वे साइबर फ्रॉड के मार्फत भी हुए थे। अतः अपराध की गंभीरता को देखते हुए प्रार्थी अभियुक्त का अग्रिम जमानत आवेदन खारिज किये जाने का निवेदन किया।

05. मैंने उपर्युक्त परस्पर विरोधी तर्कों पर विचार किया। अभिलेख के अवलोकन से प्रकट होता है कि सीबीआई/एसीबी शाखा जोधपुर को एक सुत्र सूचना इस आशय की प्राप्त हुई कि दिनांक 19.06.2024 से 09.07.2024 की अवधि में पंजाब एण्ड सिन्ध बैंक, प्रधान शाखा श्रीगंगानगर में काल्पनिक एवं अस्तित्वहीन फर्मों के नाम अज्ञात व्यक्तियों ने फर्जी/झूठे के.वाई.सी. दस्तावेजों के आधार पर 04 म्यूल चालू बैंक खाते खोले गए। ये 04 बैंक खाते अज्ञात बैंक अधिकारियों की मिलीभगत, के.वाई.सी. नियमों की अवहेलना में सम्यक् तत्परता एवं एस.ओ.पी. की पालना किए बिना खोले गए और इन खातों में करोड़ों रुपयों का संव्यवहार आपत्तिजनक प्लेटफार्म के माध्यम से हुआ। साथ ही इन खातों का उपयोग साइबर फ्रॉड और अन्य गतिविधियों से राशि प्राप्त करने, अंतरित करने के लिए किया गया। उक्त सूचना के आधार पर प्रारंभिक जांच करने पर यह पता चला था कि बैंक के तत्कालीन मुख्य शाखा प्रबंधक अमन आनन्द ने आदित्य गुप्ता उर्फ विशाल गुप्ता, प्रवीण अरोड़ा, प्रेम कुमार सेन, अतिल खान और अन्य खाताधारकों एवं अज्ञात लोक सेवकों के साथ निजी व्यक्तियों के साथ षड्यंत्र कर 04 म्यूल चालू खाते खोले गए। उनके मार्फत करीब 537 करोड़ रुपयों का संव्यहार भी किया गया था। जांच के पश्चात् प्रार्थी प्रवीण अरोड़ा सहित 10 व्यक्तियों के विरुद्ध नामजद प्रथम सूचना संख्या RCJDH 2026 A 0002, अपराध अन्तर्गत धारा 61(2) सपठित धारा 318, 336 व 340 भारतीय न्याय संहिता एवं धारा 13(2) सपठित धारा 13(1)(A) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में पंजीबद्ध की गई।

06. विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा प्रार्थी की ओर से प्रस्तुत जो अग्रिम जमानत आवेदन अंतर्गत धारा 482 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता का अस्वीकार किया गया था, उक्त आदेश के पैरा संख्या 05 के अवलोकन से यह तथ्य स्पष्ट होता है कि प्रार्थी ने एक अन्य प्रथम सूचना रिपोर्ट संख्या RCJDH 2026 A 0003, दिनांक 13.01.2026 को उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी थी, जिसमें इस न्यायालय की समकक्ष पीठ द्वारा S.B. Criminal Miscellaneous (Petition) No. 5514/2026 दिनांक 16.07.2026 के आदेश से प्रार्थी की अग्रिम आदेश तक गिरफ्तारी पर रोक लगाई गई थी, लेकिन प्रस्तुत प्रथम सूचना रिपोर्ट के मामले में भी जो उच्च न्यायालय के समक्ष याचिका पेश की गई थी, उसे प्रार्थी की ओर से बल नहीं दिए जाने के कारण निरस्त कर दिया गया था और यह तथ्य प्रथम सूचना रिपोर्ट संख्या RCJDH 2026 A 0003 पर स्थगन लेते समय प्रार्थी की ओर से छुपाया भी गया था। साथ ही प्रार्थी पर दिनांक 06.08.2026 को सूचना पत्र तामील होने के बावजूद भी वह अनुसंधान अधिकारी के समक्ष न तो उपस्थित हुआ और न ही अनुसंधान में सहयोग कर रहा है।

07. प्रार्थी के विरुद्ध अभिलेख पर अब तक संकलित की गई साक्ष्य के अनुसार जिन 04 अस्तित्वहीन फर्मों के नाम पर म्यूल चालू खाते खोले गए, उन चारों फर्मों के लिए परिसर प्रार्थी द्वारा उपलब्ध करवाया गया था और इन चारो फर्मों का जी.एस.टी. पंजीयन प्रार्थी ने आरोपी सुनिल सेठिया, सी.ए. के माध्यम से करवाया। सुनिल सेठिया ने अपने बयान में यह भी स्पष्ट कहा है कि वह प्रवीण अरोड़ा को लगभग 06 वर्षों से जानता है, जो उसके पास बैंकिंग संबंधी कार्य से आते-जाते रहते थे और डेढ़ वर्ष पूर्व उन्होंने यह भी बताया था कि बैंक की नौकरी छोड़ दी है और फाइनेंशिय कंसलटेंट के रूप में कार्य करना चाहते हैं। प्रवीण अरोड़ा द्वारा ही कई संस्थाओं को उसके पास रेफर भी किया गया था। लेकिन इन फर्मों के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने उसका कोई उद्देश्य नहीं बताया। इसके पश्चात् उन्होंने उनके द्वारा लाए गए किसी व्यक्ति अथवा संस्था की कोई नई फाइल अथवा रजिस्ट्रेशन संबंधी कार्य नहीं किया, क्योंकि उन्हें उनकी गतिविधि संदिग्ध भी लगी थी। अभिलेख पर उपलब्ध गवाह [names withheld] के कथनों में भी प्रार्थी के विरुद्ध साक्ष्य आई है। गवाह [name withheld], जो कि प्रार्थी प्रवीण अरोड़ा को जानता है, इसने भी अपनी साक्ष्य में यह बताया है कि जो एम.आर. नंबर 366 का पेज नंबर 4 से 7 है, उसके पेज नंबर 4 से 6 पर लगा किरायानामा फर्जी तरीके से तैयार किया गया था। गवाह प्रेम कुमार सेन के भी बयान में यह तथ्य आया है कि गवाह प्रवीण अरोड़ा ने उसे यह कहा था कि जाननेवाले रिश्तेदारों से संपर्क करके पेन कार्ड, आधार कार्ड, फोटो इत्यादि उपलब्ध करावें, ताकि उनके नाम से फर्म खोली जाएगी और इसके बदले 20,000 रुपये प्रति खाता देने की बात कही गई थी, इस पर उसने उपलब्ध भी करवाए थे। इन खातों का उपयोग प्रवीण अरोड़ा द्वारा दुबई, दिल्ली, चंडीगढ़ में बैठे लोगों से करवाया जाता था और इनसे संबंधित दस्तावेज उन्होंने ही फर्जी तैयार करवाए थे और वे विभिन्न फर्मों के लिए व्यक्तियों को खाता खुलवाने के लिए मुलाकात करवाने के लिए कहते भी रहते थे और सभी काम प्रवीण अरोड़ा द्वारा गुप्त तरीके से किए जाते थे। इस प्रकार अब तक जो अभिलेख पर संकलित साक्ष्य की गई है, उसके अनुसार 537 करोड़ रुपये का संव्यवहार करते हुए साइबर फ्रॉड किया जाना बताया गया है। अभिलेख के अवलोकन से ऐसा नहीं लगता कि प्रार्थी को इस प्रकरण में मिथ्या रूप से फंसाया जा रहा हो।

08. अग्रिम जमानत की सुविधा उन परिस्थितियों में ही न्यायालय द्वारा प्रदान की जा सकती है, जबकि स्पष्टतया ऐसा लगे कि प्रार्थी के विरुद्ध प्रथमदृष्टया मामला नहीं बन रहा है और उसे मिथ्या गिरफ्तार किया जा रहा हो। इस संबंध में माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्णय P. Chidambaram v. Directorate of Enforcement, AIR 2019 SC 4198 में धारा 438 दंड प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों की व्याख्या करते हुए माननीय उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि- अग्रिम जमानत केवल तभी प्रदान की जानी चाहिए जब न्यायालय इस बात से संतुष्ट हो कि इस असाधारण उपचार का सहारा लेने के लिए अपावादत्मक परिस्थितियाँ विद्यमान हैं। लेकिन इस प्रकरण में इस प्रकार की कोई आपवादिक परिस्थितियां मौजूद होना प्रकट नहीं होता है।

09. अतः प्रस्तुत तर्कों, अभिलेख पर उपलब्ध सामग्री, प्रकरण के तथ्यों-परिस्थितियों, आक्षेपित अपराध की प्रकृति आदि को दृष्टिगत रखते हुए, प्रकरण के गुणावगुण पर कोई विवेचन किए बिना प्रार्थी अभियुक्त को अग्रिम जमानत का लाभ दिया जाना न्यायोचित प्रतीत नहीं होता है।

10. परिणामतः प्रार्थी अभियुक्त प्रवीण अरोड़ा की ओर से प्रस्तुत अग्रिम जमानत आवेदन अंतर्गत धारा 482 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता खारिज किया जाता है।

(CHANDRA SHEKHAR SHARMA),J
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